साझे की हंडिया मध्यावधि पे…………….

साझे की हंडिया मध्यावधि पे…………….
आलोक पुराणिक
बेटे एक हंडियात्मक कहावत यह और है कि काठ की हंडिया एक ही बार चढ़ती है
-मैने समझाने की कोशिश की।
कहां चढ़ती है एक बार, ये तो लगातार चढ़े जा रही है। पहले भाजपा के काठ की थी, अब कांग्रेस के काठ की है। काठ अब नये टाइप का हो गया है, फिर ये हो गया है कि हंडिया चढ़ाते नहीं हैं भाई लोग, पब्लिक को बहकाये रहते हैं कि चढ़ा दी है। चढ़ने वाली है-छात्र कुछ तार्किक सी बातें कर रहा है।
यार तुम सब उल्टा-पुल्टा समझते हो। मैं तुम्हे वो वाली कहावत समझा रहा हूं कि साझे की हंडिया एक बार ही चढ़ती है, और तुम ना जाने कहां की बातें लेकर बैठ जाते हो। समझो कि साझे की हंडिया को लेकर चौराहे पर मार-धाड़ होती है-मैंने फिर समझाना शुरु किया है।
पर मार-धाड़ कहां होती है। सब मिलते हैं। प्रणव मुखर्जी हंसते हुए जोक सुनाते हैं। कामरेड हंसते हुए कोक पीते हैं। सब हंसते-ठेलते विदा होते हैं। लालूजी सबके हाथ मिलवाते हैं। फिर मनमोहन सिंह कह देते हैं कि हो तुमको जो पसंद वही बात कहेंगे। कुश्ती होती नहीं है, हाथ पहले मिल जाते हैं। कुश्ती की दुनिया में इसे फ्राड कहा जाता है। और पब्लिक ऐसे पहलवानों को ठोंक भी देती है। ये लड़ाई कहां है, ये तो मीटिंग-ईटिंग है। क्या झगड़ा इस बात पर होता है कि आज मछली इस फाइव स्टार होटल से नहीं उस फाइव स्टार होटल से मंगायी जायें। या फिर आज खाना इंटरकांटीनेंटल नहीं सिर्फ देसी खाया जाये। क्या झगड़े के मसले ये हैं-छात्र फिर कह रहा है।
नहीं बेटे, ये नेता लोग जब मिलते हैं, तो लड़ाई के बाद भी हंसते ही हैं। मतलब हंसने का काम नेताओं का है। रोने के लिए पब्लिक है ना। मतलब यूं समझो कि ये नेता आने वाले चुनावों की तैयारी कर रहे हैं। यार तुम कहावत को रिवाइज कर लो, समझो नयी कहावत यूं है –साझे की हंडिया मध्यावधि पे फूटती है, समझे-मैं उसे फाइनली समझाने की कोशिश कर रहा हूं।
पर यहां मध्यावधि पे कहां फूट रही है। बिचारे भाजपा वाले ताक में बैठे थे, कि फूटे तो कुछ गुल-गपाड़ा हो। भाजपा वाले लेफ्ट वालों पर कितना डिपेंड कर रहे थे, लेफ्ट ने भाजपा को धोखा दे दिया। भाजपा वाले गलत नहीं कहते। लेफ्ट पर भरोसा नहीं किया जा सकता-स्टूडेंट बता रहा है।
बेटे तुम भटक जाते हो, मैं हंडिया फूटने की कहावत बता रहा था तुम भाजपा पर पहुंच गये। यार ये भाजपा को हंडिया से क्यों जोड रहे हो-मैंने स्टूडेंट को समझाने की कोशिश की।
भाजपा का हाल तो ऐसी हंडिया का हो लिया है, जिसमें कुछ भी नहीं पकता। लेफ्ट वालों की हंडिया में कम से कम आवाज तो आती है। यहां से तो आवाज भी नहीं आती। आप तो वह वाली कहावत का मतलब समझाओ- नौ भाजपाई, तेरह चूल्हे-छात्र नयी कहावत का मतलब पूछ रहा है।
अब आप बताइए, इस इस ब्रांड न्यू कहावत का मतलब कैसे समझाया जाये।
आलोक पुराणिक
मोबाइल-09810018799

10 Responses to “साझे की हंडिया मध्यावधि पे…………….”

  1. भई ज्यादा क्या कहें - गुरु गुड़ ही रहा चेला चीनी हो गया। :)

  2. समझाईये समझाईये-आप तो ब्रहमान्ड के सबसे बड़े अगडम बगडम शैली के व्याखाता हैं, तो इसमें क्या दिक्कत आना चाहिये मगर जो भी समझायें वो हमें जरुर बताईयेगा. :)

  3. उसके बताइये कि नौ नकद ना तेरह उधार की तरह भाजपा के पास न तो नौ नकद हैं और ना तेरह उधार. पूरी की पूरी हंडिया लैफ्ट वालों के पास ही है.

  4. आप ब्रह्माण्ड के महानतम विचारक हैं। कहां हण्डिया-वण्डिया के चक्कर में पड़े हैं। खुदै कह रहे हैं कि मध्यावधि सन्निकट हैं। खुद्दै कह रहे हैं कि व्यंगकारों की टोली बढ़ रही है। तब काहे को पोस्ट लिखने में समय बरबाद कर रहे हैं। एक व्यंग-रेली करवाइये। पार्टी बनवाइये और अपने को अध्यक्ष। भावी प्रधानमंत्री के रूप में अपनी प्राथमिकतायें गिनाइये और लेफ्ट-राइट-सेण्टर से गठबन्धन की सम्भावनायें तलाशिये।
    मेनीफेस्टो बनाइये/बनवाइये। उसमें भरी जाने वाली रेवड़ीयों का साइज और प्रकार तय कीजिये।
    मतलब यह कि समय बरबाद करने का नहीं है।
    कोई स्माइली नहीं लगा रहा - यह सीरियस सुझाव है।

  5. काठ की हंडिया दूसरी बार चढ़े ना चढ़े, आलोक जी तो एक ही हंडिया को दो दो बार चढ़ा लेते हैं , मेरा मतलब, एक ही हंडिया पर दो दो बार लिख लेते हैं और खूब लिख लेते हैं ।
    घुघूती बासूती

  6. आपका हंडिया पुराण पढ़ कर दिल हंडिया-हंडिया हो गया. कृपया कुछ अध्याय और जोडें.

  7. यदि जनता इस तरह की कुश्ती से ध्यान हटा ले तो छलने वाले भी सुधर जायेंगे। बस रिमोट का बटन दबाकर चैनल बदलने और अखबार को किनारे करने की जरूरत है। वैसे देश का एक बडा हिस्सा तो यही कर रहा है। कुछ हम आप जैसे लोग है जो इस पर नजर गडाये बैठे है।

  8. गुरु देव काठ की हांडी कई बार चढ़ सकती है…..बस नीचे ऊपर या कहीं से भी आँच बुझा दें…..

  9. ये राजनीतिक हांडी है। हर बार चढ़ती है।

  10. भाई राजनीति की टू हांडी ही काठ की होती है. वह जितनी बार चाहे चढ़ सकती है.

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