राकेट में खली

भाई साहब बुरा ना मानना, यकीन सा नहीं हो रहा है- जिस मुल्क में दस मिनट संसद कायदे से नहीं चलती, उस मुल्क में एक राकेट दस सैटलाइटों को लेकर चला गया आसमान में। टीवी चैनलों में इस पर ज्यादा कुछ नहीं आया, क्योंकि इस राकेट और सैटलाइटों का खली से कुछ लेना देना नहीं था। जिन आइटमों में इन दिनों खली, नाग या राखी सावंत नहीं होतीं, उन्हे आम तौर पर न्यूज नहीं माना जाता है। एक जमाने में एक अखबार का विज्ञापन हुआ करता था –ट्रुथ इन्वाल्व्स अस यानी सत्य हमें शामिल करता है। हमारे बगैर सत्य नहीं होता टाइप। अब न्यूज का मतलब ही है कि खली,नाग या राखी सावंत। अंतरिक्ष रिसर्च वालों से अनुरोध है कि अगली बार किसी राकेट का नाम खली रख दे, फिर अंतरिक्ष वालों को मीडिया का टोटा नहीं पड़ेगा।
वैसे ये राकेट वाकेट के काम दिल्ली से दूर होते हैं, ठीक हैं। दिल्ली की हवा फिजा कुछ ऐसी है, कि काम गड़बड़िया जाते हैं। जैसे अगर राकेट वाकेट दिल्ली में होते, तो एक सीन यह हो सकता था-
1-दस सैटलाइट में चार सैटेलाइट बाहर कूद जाते, और राकेट के बाहर उड़ते। बाहर के सैटलाइटों से आवाज आती, बाहर से सपोर्ट, बाहर से सपोर्ट। कुछ तो इनमें से राकेट से टकरा जाते, बाहर से सपोर्ट। दिल्ली की फिजा कुछ ऐसी है बाहर से सपोर्ट और टकराने में ज्यादा फर्क नहीं होता।
2-राज ठाकरे की पार्टी के लोग कहते कि चूंकि यह राकेट उत्तर भारत से नहीं उड़ा है, इसलिए ये ठीक काम कर सकता है। अगर राकेट के पुर्जे उत्तर भारत के हैं, तो फिर इन्हे उत्तर भारत चला जाना चाहिए। राकेट चले या नहीं चले, इससे मतलब नहीं है। मुद्दा यह है कि उत्तर भारतीय नहीं चलने चाहिए।
3-दिल्ली में रैपिड बस कारीडोर से दुखी पब्लिक का कहना यह है कि भईया अंतरिक्ष वालो अंतरिक्ष का काम आसान है, एक राकेट पर दस सैटलाइट ठेल दो। यहां साऊथ दिल्ली में एक बस को ही दस किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से ठेल कर दिखाओ। इस पर अंतरिक्ष रिसर्च वालों ने कहा है कि अंतरिक्ष में राकेट वाकेट चला लेने से ज्यादा की क्षमताएं अभी अंतरिक्ष वालों की नहीं है। दिल्ली में दस किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली बस लांच होने में पता नहीं कितने साल लग जायेंगे।

दुबई शापिंग का तोड

हर कायदे का आदमी इन दिनों दुबई शापिंग करने जा रहा है, या दुबई से वापस आ रहा है। दुबई में शापिंग फेस्टीवल की तरफ लोग जा रहे हैं-पत्नी ने बताया।
हमें जिन आइटमों की जरुरत होती है, वह सब मैसर्स छोटूमल मोटूराम एंड सन्स किराना स्टोर्स (स्थापित 1930) में मिल जाती हैं, हम क्यों जायें दुबई-मैंने साफ किया।
यही तो बात है, हम छोटू मोटू तक सीमित हैं। हमें अपनी जरुरतों का दायरा दुबई तक बढ़ाना चाहिए। जिसकी जरुरत के आइटम लोकल स्टोर पर मिल जायें, अब वह पिछड़ा माना जाता है। अब चीजों को खरीदने के लिए दुबई जाना जरुरी है। कुछ गरीब टाइप के लोग सिंगापुर भी चले जाते हैं। पर छोटू मोटू स्टोर की तो बात तक कोई करता-पत्नी ने विस्तार से बताया।
देखो, दुबई या तो बड़े आदमी जाते हैं या तस्कर। तस्कर मैं बन नहीं पाया, और बड़ा आदमी मुझे कोई मानता नहीं है। फिर मैं दुबई क्यों जाऊं-मैंने फिर तर्क दिया।
तुम ठीक टाइम पर तस्कर हो जाते, तो अब तक बड़े आदमी बन जाते। खैर कोई बात नहीं, तीन चार बार दुबई हो आओगे, तो लोग तुम्हे वैसे ही बड़ा आदमी मानने लगेंगे-पत्नी ने आगे बताया।
देखो, तुम समझने की कोशिश करो। सुरक्षा कारणों से दुबई जाना सेफ नहीं है। दुबई जाने वालों को आम तौर पर सही निगाह से नहीं देखा जाता। मतलब कुछ ऐसी ही निगाहों से उन्हे देखा जाता है-मैंने आगे बताने की कोशिश की।
ये तुम बीस साल पुरानी बात कर रहे हो। तब दुबई और स्विटजरलैंड जाने वालों को लोग शक की निगाह से देखते थे। अब तो दुबई शापिंग के लिए और स्विटजरलैंड बैंक खातों के लिए ना जाने वालों को लोग अलग निगाह से देखते हैं। लोग मान कर चलते हैं या तो चिरकुट है, कमा वमा नहीं पाया। या ये विकट काइयां है। सारी रकम यहीं घऱ में गढ्ढे में गाड़कर रखता है, स्विस बैंकों में नहीं ले जाता-पत्नी ने लेटेस्ट सिचुएशन साफ की।
अच्छा एक काम करो, तुम ये कैलकुलेट करो कि जितने लाख तुम्हारे पास हैं, उनसे कितने किलो आलू और कितने किलो टमाटर खरीदे जा सकते हैं लोकल सब्जी मंडी से-मैंने पत्नी से पूछा।
पैंतालीस किलो आलू और सैंतीस किलो टमाटर। हाय दुबई शापिंग के सारे पैसों से तो इत्ते आलू टमाटर ही आयेंगे-पत्नी चकरायमान है।
राइट,अब समझ लो , दुबई वो लोग जा रहे हैं, तो लोकल टमाटर आलू अफोर्ड नही कर सकते। दुबई से सस्ते कैमरे वगैरह लेकर ही काम चला रहे हैं-मैं पत्नी को समझा रहा हूं।
राइट, समझ में आ गया मुझे। दुबई शापिंग फेस्टिवल के मुकाबले लोकल सब्जी शापिंग ज्यादा प्रेस्टीजियस है-पत्नी बता रही है।

कैटरीना पर फोकस

आलोक पुराणिक
आईपीएल की महंगी टीमों में से एक बंगलूर रोयल ने मैचों की नहीं, हारे हुए मैचों की श्रंखला खेली है। बंगलूर टीम के चीफ राहुल द्रविड़ से तमाम मसलों को लेकर जो बातचीत हुई है, वह इस प्रकार है-

सवाल-सरजी ये तो आपकी टीम की परफारमेंस बहुत खराब रही है आईपीएल में।
राहुल द्रविड़ उर्फ राद्र-देखिये इट्स टीम वर्क ना। सिर्फ बालिंग, बैटिंग और फील्डिंग खराब होने से तो आप हमारी टीम की परफारमेंस को खऱाब नहीं ना कह सकते। हमारी टीम की ब्रांड एंबेसडर कैटरीना कैफ की परफारमेंस बहुत शानदार रही है। उनकी क्यूट स्माइल को कैद करने में कई कैमरे लगे रहे। और फिर हमारी चीयर डांसर्स की परफारमेंस का तो कोई मुकाबला ही नहीं है। हमारी चीयर डांसर्स के सामने बाकी टीमों की चीयर्स डांसर्स तो ऐसी लगती हैं, जैसी करण जौहर की स्विस शूटिंग वाली फिल्मों के आगे ओम पुरी नसीरुद्दीन शाह की पुरानी आर्ट टाइप फिल्में। आपको परफारमेंस को कंपलीट एंगल से देखना होगा। क्रिकेट इज टीमवर्क ना।

सवाल-नहीं मेरा पूछने का मतलब यह है कि बंगलूर टीम की परफारमेंस से पब्लिक को मजा आये, इसके लिए क्या किया जाना चाहिए।
राद्र-हम चाहेंगे कि बंगलूर रोयल मैचों के दौरान कैमरे क्रीज, पिच, फील्ड पर फोकस ना रहें। कैमरों को हमारे चीयर डांसर्स पर कैटरीनाजी पर फोकस रहना चाहिए। कभी कभार जब हम छक्का मार दें, तो कैमरे हमारी तरफ घूम जायें। मतलब चीयर डांसर्स की परफारमेंस पर कैमरे फोकस रहेंगे, तो पब्लिक को शिकायत नहीं होगी। अभी शिकायत यह हो सकती है कि इत्ता अच्छा डांस चल रहा है उधर, और कैमरों ने राहुल द्रविड़ को आऊट होता दिखाकर बोर कर दिया। अगले मैच में हम ध्यान रखेंगे के कैमरों का फोकस सही हो। यू नो, इट्स टीमवर्क ना।

सवाल-सरजी, मेरी राय में तो आपकी परफारमेंस देखने आती है।
राद्र-देखिये आप ऐसा कहकर टीम स्पिरिट का अपमान कर रहे हैं। ऐसा आप कैसे कह सकते हैं कि पब्लिक सिर्फ बालिंग, बैटिंग और फील्डिंग देखने आती है। मतलब ये जो इतना रियाज इतनी मेहनत, इतनी प्रेक्टिस चीयर डांसर्स करती हैं, इसका कोई मतलब नहीं है क्या। आप इनके काम को यूं लाइटली नही ले सकते। मैं फिर कहता हूं कि इट्स टीमवर्क ना।

सवाल-मेरा कहना यही है कि जितनी मेहनत, जितनी प्रेक्टिस आपकी चीयरडांसर्स की दिख रही है, उतनी आपकी मेरा मतलब कि फील्ड के अंदर के खिलाड़ियों की नहीं दिख रही है।
राद्र-ओफ्फो, तो इस पर आप क्यों चिंतित हो रहे हैं। यह हमारी टीम का आंतरिक मामला है कि टीम के डांसर्स के मुकाबले टीम के प्लेयर अच्छा क्यों नहीं खेल रहे हैं। इस पर मैं कुछ बयान नहीं दे सकता। ये सारी बातें टीम की अंदर की बातें हैं। वैसे छोड़िये सब, आप डांस देखिये।
अब बताइए, इसके आगे क्या सवाल पूछा जा सकता है।

आलू से बालू तक

बच्चों आज हम क्लास में बालू विमर्श करेंगे। केंद्रीय परिवहन मंत्री बालूजी ने जो किया है, कहा है, उस पर चिंतन करेंगे। बालूजी ने अपने बेटे की कंपनी को मदद की, इसे राजनीति में किस तरह से देखा जाना चाहिए-मैंने राजनीति शास्त्र की क्लास में पूछा।

भला आदमी अपने बेटे की मदद नहीं करेगा, तो क्या करेगा। वो तो टीवी सीरियलों में होता है कि एक बंदे की तीन शादियां आफिशियल होती हैं, फिर पांच शादियां अनआफिशियल होती हैं। पांच शादियों के आठ अनआफिशियल बच्चों की मदद सीरियल का हीरो करता है। नेताओं का चरित्र सीरियल वालों जैसा नहीं होता। उसके बेटों का मामला साफ होता है और वह अपने बेटों की ही मदद करता है। प्राबलम क्या है-छात्र ने बताया।

क्या मंत्री को अपने बेटे की मदद करनी चाहिए-मैंने पूछा।

नहीं सिर्फ बेटे की नहीं, जेंडर इक्वलिटी की मामला है, बेटी की मदद भी करनी चाहिए। दामाद की मदद भी करनी चाहिए। एनडीए सरकार में पेट्रोल पंप बंटे थे, तो बेटी, दामाद सबकी केयर की गयी थी। बालूजी ने हो सकता है कि अभी सिर्फ बेटे की मदद की हो। पर हमें निराश नहीं होना चाहिए। आगे और भी संभावनाएं हैं-छात्र ने आश्वस्त किया।

ओफ्फो,मुद्दा यह है कि मंत्री को आम आदमी की मदद करनी चाहिए-मैंने फिर समझाया।

बालूजी ने बेटे की कंपनी की मदद की। अब आम आदमी की कंपनी कहां होती है। वह ससुरा तो आलू प्याज के भावों में उलझता रहता है। अब कंपनी नहीं है, तो फिर कैसे मदद करेंगे। वैसे आम आदमी के आलू आटे के बारे में सोचने का जिम्मा खेती किसानी के मंत्री शरद पवारजी का है। पर वह इधर आईपीएल में बिजी हैं। आटे वगैरह पर ध्यान कम दे पा रहे हैं। पर बालूजी कर्मठ मंत्री हैं। अपना काम किये जा रहे हैं। जहां मदद करनी है, वहां कर रहे हैं। -छात्र ने एक्सप्लेन किया।

तुम बहुत अगड़म बगड़म तर्क दे रहे हो। मेरा मानना है कि मंत्रियों को आम आदमी की समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए-मैंने नाराज होकर कहा।

अब पवार साहब भी अपने हिसाब से कर ही रहे हैं। आईपीएल के डांस देखकर भी अगर आपको आटे आलू की याद आती है, तो सर आपका सौदर्य बोध गड़बड़ है। आलू बोध को डांस बोध में बदलिये ना। बालूजी पर काहे नाराज हो रहे हैं, प्राबलम क्या है-छात्र मुझे समझा रहा है।

अब मुझे समझ में आ गया है डांस बोध उन्नत करना चाहिए, बस फिर प्राबलम क्या है।

आंसू मांगेंगे जवाब

बच्चों आज हम डिस्कशन करेंगे कि किस तरह से क्रिकेट की कवरेज करनी चाहिए-मैंने छात्रों को समझाना शुरु किया।

सर कुछ जासूसी उपन्यास मैं ले आया हूं। हमें इनके शीर्षकों के जरिये क्रिकेट समझाइये। आंसू मांगेंगे जवाब, थप्पड़ का जवाब दूंगा, थप्पड़ पुकारेगा, भाई ना हो तो ऐसा-एक छात्र ने बताया।

नहीं, हम क्रिकेट के बारे में समझने की कोशिश कर रहे हैं-मैने समझाने की कोशिश की।

हम भी क्रिकेट के बारे में ही समझने की कोशिश कर रहे हैं। सुलह के इंजीनियर, थप्पड़ के बाद , ग्यारह के भाव में,. कुछ इस तरह के शीर्षक भी तो हो सकते हैं ना-छात्र ने मुझे समझाने की कोशिश की।

यह क्रिकेट नहीं है। तुम क्रिकेट पर, खिलाड़ियों पर, अंपायरिंग पर फोकस करो-मैंने समझाने की कोशिश की।

ओ के, एक शीर्षक यह हो सकता है-तुम हमें ले डूबे सनम। अंपायर साहबा को आईपीएल ने दो मैचों के लिए सस्पेंड कर दिया है, क्योंकि उन्होने श्री संत के बारे में कमेंट किया था-छात्र आगे बता रहा है।

वो मसला खत्म हो गया है। हरभजन सिंह ने कह दिया है कि श्री संत के प्रति उनके मन में कोई दुर्भावना नहीं है-मैंने समझाने की कोशिश की।

ग्रेट क्रिकेटीय लैसन, हमें थप्पड़ दुर्भावना के बगैर मारने चाहिए। मतलब नार्मल थप्पड़, यूं ही जब मन करे। सर यह शीर्षक हो सकता है नार्मल थप्पड़, यूं ही टाइप। वैसे सर दुर्भावना वाले थप्पड़ और नार्मल थप्पड़ में क्या फर्क होता है। आप हमें क्रिकेट की बारीकियां नहीं समझा रहे हैं, समझाइये प्लीज-छात्र ने पूछा।

देखो, हम क्रिकेट डिस्कस कर रहे हैं। ये थप्पड़ और घूंसों के बारे में तो बाक्सर मोहम्मद अली बता सकते हैं। घूंसों के एक्सपर्ट तो वही हैं-मैंने बताया।

ओ के इसका मतलब यह हुआ कि टीम के कोच के तौर पर मोहम्मद अली को लाया जाना चाहिए। पर मोहम्मद अली तो बहुत कम कपड़े पहन कर परफार्म करते हैं। मतलब इस पर तो मुंबई के मिनिस्टर लोगों को आपत्ति हो जायेगी-छात्र ने आगे पूछा।

मोहम्मद अली जितने भी कपड़े पहनते हैं, वो चीयर डांसरों से ज्यादा ही होते हैं। और ये तुम कपड़ों की बात क्यों कर रहे हो। क्या तुम फैशन डिजाइनर हो। हमें सिर्फ क्रिकेट के बारे में ही समझना चाहिए-मैंने छात्र से फिर कहा.

सर हम तो क्रिकेट समझना चाहते हैं, पर आप समझा ही कहां पा रहे हैं-छात्र ने उलट जवाब दिया है।

वैसे बात यही है और सही है कि मैं क्रिकेट समझा ही कहां पा रहा हूं।