वैधानिक चेतावनी-यह व्यंग्य नहीं है
2008 का सीन भारत के लिए मिक्स्ड ही माना जायेगा, अर्थव्यवस्था संकट में तो आयी, पर उतने संकट में नहीं, जिसमें विश्व की बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दिखायी पड़ रही हैं। यानी संकट में, मंदी में भी यह माना जा रहा है कि 2008-09 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर सात फीसदी तो रहेगी ही। मंदी के दौर की यह विकास दर भी उपलब्धि से कम नहीं है। 2008 ने यह बता दिया है कि ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया के अपनी समस्याएं हैं। उनसे निपटने की लोकल तैयारियां अगर ना हों, तो ग्लोबलाइजेशन पूरी अर्थव्यवस्था को डुबो सकता है।
2008 की पूरी ग्लोबल वित्तीय उथल पुथल में भारतीय बैंक समस्या में क्यों नहीं आये। इस सवाल के जवाब में एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने जो जवाब दिया है, वह दरअसल पूरी समस्या और इसके भविष्य के सूत्र को समझने में मदद करता है। इस अधिकारी ने बताया कि भारतीय बैंकिंग का करीब सत्तर प्रतिशत तो सरकारी बैंकों के हाथ में है। सरकारी बैंकों से कर्ज लेना बहुत मुश्किल काम है आम तौर पर। जब कर्ज मिलेगा ही नहीं, तो डूबने का तो सीन ही बनता। रकम डूबी नहीं, तो भारतीय बैंकिंग जगत के अधिकांश हिस्से के लिए समस्या का सवाल ही पैदा नहीं हुआ।
सरकारी बैंक कर्ज देने में आम तौर पर अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं। यह अतिरिक्त सावधानी कितनी कीमती होती है, यह हाल के घटनाक्रम में साफ हो गयी है। जिन अमेरिकी बैंकों की कर्ज देने की तत्परता को बहुत ही ग्राहक फ्रेंडली बताया जाता है, उनमें से अधिकांश इतिहास के कूड़ेदान में चले गये हैं। बैंकिंग जगत में विश्वव्यापी तबाही के बावजूद भारतीय बैंकों की स्थिति मजबूत रही, इससे पूरे विश्व को एक महत्वपूर्ण संदेश यह जाता है, कि आर्थिक मामलों में, वित्तीय मामलों में डरना जरुरी है। पूरी अमेरिकन संकट दरअसल बैंकों , वित्तीय संस्थानों की आक्रामक मूर्खता और उन्हे नियंत्रित करने वाली संस्थाओं की अदूरदर्शिताओं की कहानी ही कहता है।
भारतीय बैंकों, वित्तीय संस्थानोँ को धुआंधार कर्ज बांटने में डरना चाहिए, यह बात एक बार फिर साफ हो गयी है। तेजी के वक्त में तो हर तरह के संस्थान मुनाफा कमा लेते हैं, यह तो संकट के समय ही पता चलता है कि प्रबंधन का स्तर कहां पर कैसा है।
2008 के सबक साफ हैं कि वित्तीय संस्थानों के लिए डरना जरुरी है और उनकी नियामक संस्थाओं को भी डरना चाहिए और इस डर के हिसाब से कदम उठाने चाहिए। 2008 का एक सबक साफ यह है कि लगातार उधारी पर अर्थव्यवस्थाएं नहीं चल सकतीं। अमेरिकन अर्थव्यवस्था विकट उधारखाऊ अर्थव्यवस्था है। मोटे तौर पर वहां सकल घरेलू उत्पाद के तीन गुने से भी ज्यादा का कर्ज लदा हुआ है। इस संकट ने बताया है कि उधार का इस्तेमाल अगर उत्पादक कामों में नहीं हो रहा है, तो रिजल्ट परेशानी वाले होते हैं। भारत में क्रेडिट कार्ड कारोबार हाल तक चालीस प्रतिशत सालाना की रफ्तार से बढ़ता रहा है। अमेरिका से सीखने का सबक यह है कि उधार मिलना आसान नहीं होना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण सबक उदारीकृत अर्थव्यवस्थाओं के फायदे उठाने वालों के लिये यह भी है कि लाभ हानि खाते में हानि का भी कालम होता है और बैलेंस शीट में सपत्ति के साथ दायित्वों का भी कालम होता है। उदारीकृत होती अर्थव्यवस्था में जब कंपनियों का कारोबार फैल रहा था, नये रोजगार पैदा हो रहे थे। बैंकिंग,आटो, उड्डयन,बीपीओ, साफ्टवेयर में लोगों के वेतन हर साल दो गुने हो रहे थे। तब उदारीकृत अर्थव्यवस्था के फायदे सबको नजर आ रहे थे। पर अब यह भी उसी व्यवस्था का एक पक्ष है कि जब मुनाफे सिकुड़ चुके हैं, कारोबार मंदी की गिरफ्त में हैं, तब नौकरियां जायेंगी। जेट एयरवेज से निकाली गयी एयरहोस्टेस और एयरहोस्टों के परेशान हाल चेहरे दरअसल 2008 की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक इमेज हैं।
2008 ने बताया है कि जिन सेक्टरों को भारतीय अर्थव्यवस्था का स्टार सेक्टर बताया जा रहा था, उनके सितारे गर्दिश में आ गये हैं। बीपीओ, साफ्टवेयर, आटोमोबाइल ये उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के स्टार सेक्टर रहे हैं। पर ग्लोबल मंदी के असर इन उद्योगों पर दिखायी दिये हैं। देश की सबसे बड़ी ट्रक निर्माता कंपनी टाटा मोटर्स का सितंबर 2007 में खत्म हुई तिमाही में शुद्ध मुनाफा था-526.84 करोड़ रुपये, एक साल बाद यानी सितंबर 2008 में खत्म हुई तिमाही में यह घटकर रह गया-346.99 करोड़ रुपये। एक साल की अवधि में शुद्ध मुनाफे में करीब 34 प्रतिशत की गिरावट आ गयी।
ट्रक नहीं बिक रहे हैं, क्योंकि ट्रक खरीदने वालों की दिलचस्पी कम हो गयी है। ट्रक खरीदने वालों की दिलचस्पी इसलिए कम हो गयी है कि पहले ही खरीदे गये ट्रकों की ईएमआई चुकाना मुश्किल हो रहा है। नये ट्रकों के लिए कारोबार नहीं है। जब पुराना ही माल स्टाक में हो, तो नये माल को मंगाने की जरुरत क्या है। कुल मिलाकर टाटा मोटर्स के आंकड़े सिर्फ इस कंपनी की नहीं, समूची अर्थव्यवस्था की कहानी कहते हैं। कारों की सबसे बड़ी कंपनी मारुति का सितंबर, 07 को खत्म हुई तिमाही में शुद्ध लाभ था-466.50 करोड़ रुपये, यह सितंबर 08 की मंदीग्रस्त तिमाही में गिरकर रह गया 296.12 करोड़ रुपये यानी करीब 37 प्रतिशत की गिरावट।
इस सबके बावजूद तमाम सकारात्मक तथ्य भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में खड़े हैं। मंदी के इस दौर में भी हर महीने एक करोड़ नये मोबाइलधारक मोबाइल जनसंख्या में जुड़ रहे हैं। निजी क्षेत्र के बेहद आक्रामक माने जाने वाले बैंक भी अब उधार देने में संयम बरतना सीख रहे हैं। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगातार कम होती दिख रही है। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेल के भाव कमजोर होते दिख रहे हैं। पर इन सारे कारकों के बावजूद शेयर निवेशकों को 21,000 के सेनसेक्स के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा, यह आंकड़ा 2009 में तो आता नहीं दिखता। दरअसल शेयर बाजार मोटे तौर पर अब 2005 के लेवल पर हैं, जब विदेशी संस्थागत निवेशकों ने जमकर खरीदारी शुरु की थी। अब चूंकि विदेशी संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी भारतीय बाजारों में कई कारणों से कम हो गयी है, तो बाजार पुन 2005 वाली गति की ओर उन्मुख हो गये हैं।
कुल मिलाकर 2009 के लिए संदेश यही है निवेशकों के लिए, उपभोक्ताओँ के लिए, उधार देने वालों के लिए, उधार लेने वालों के लिए, नियामक संस्थाओँ के लिए कि डरना जरुरी है। और 2009 में डरने की वजहें कम होने के आसार नहीं हैं, क्योंकि अब भारत जैसी अर्थव्यवस्था काफी हद ग्लोबल कारकों से जुड़ चुकी है। अमेरिका की जो गति हो गयी है और यूरोप की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जिस गति से गुजर रही हैं, उनमें निकट भविष्य में सुधार की कोई संभावना नहीं है।
डर और इंतजार 2009 के केंद्रीय भाव रहेगे।
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