हसीना उर्फ आटो

इधर आटो रिक्शाओँ के अध्ययन में जुटा, तो कई ज्ञान की बातें मालूम पड़ीं।

एक आटो के पीछे लिखा था-फिर मिलेंगे।

ऐसा अकसर होता है आटो वाले से पूछें कि अलां कालोनी चलोगे, तो वह बताता है कि नहीं, वह तो फलां कालोनी जा रहा है, और चला जाता है, संदेश देकर फिर मिलेंगे। फिर मिलने के बाद भी यही डायलाग होता है कि हम तो फलां कालोनी….।

दिल्ली में खास तौर पर यह होता है, जहां आटो वाले को जाना होता है, वहां आपको नहीं जाना होता। पर यह आपकी समस्या है कि आप वहां क्यों नहीं जाते, जहां आटो वाला जा रहा है।

बल्कि अब तो यह हो गया कि यह खाकसार पहले यही पूछ लेता है आटो वाले से कि भाई साहब कहां को जा रहे हैं। अगर कहीं रास्ते में हमारी मंजिल आती हो, हमें भी डाल लीजिये अपने साथ।

खैर मसला यह नहीं था। मसला था आटो के पीछे लिखे ज्ञान संदेशों का। एक के पीछे लिखा था-दोस्ती पक्की, पर खर्चा अपना अपना।

यह आटो वाला इधर के इंटरनेशनल घटनाक्रम से वाकिफ नहीं लगा।

अमेरिका और पाकिस्तान में दोस्ती पक्की, पर सारा खर्चा अमेरिका का-यह माडल उभर रहा है।

पक्की दोस्तियां टिकती ही इसी आधार पर हैं कि एक पूरा खर्चा उठाने को तैयार हो। खर्चा अपना अपना ही करना है, तो दोस्ती की जरुरत क्या है। पाकिस्तान से ज्यादा बेहतर यह बात कौन समझ सकता है और कौन समझा सकता है।

एक आटो के पीछे लिखा था-दुश्मनों से निपट लेंगे, दोस्तों से बचकर रहो।

लगता था कि हाल में किसी पालिटिकल पार्टी के टिकट से चुनाव लड़कर हार गया था भाई। दुश्मन ने तो एक बार ही हराया। बाकी पुराने गठबंधन वाली पार्टी के पुराने दोस्त रोज चिढ़ाते से लगते हैं, हालत एकैदम लालूजी और रामविलास पासवानजी वाली हो गयी लगती है। पुराने दोस्तों से निपटना मुश्किल होता है। लालूजी और रामविलास पासवानजी से ज्यादा बेहतर इस बात को कौन समझ सकता है और कौन समझा सकता है।

एक आटो के पीछे लिखा था-मालिक की गाड़ी, ड्राइवर का पसीना, दौड़ती है सड़क पर बन कर हसीना।

पता नहीं, इस शेर का हसीनाओँ ने बुरा क्यों नहीं माना।

हरी पीली काली एक सी परमानेंट धज में धूप में इधर से उधर दौड़ने वाले आटो को हसीना कहने पर भी हसीनाएं बुरा नहीं मान नहीं रहीं हैं। इसका मतलब यह है कि वो आटो वालों से झगड़ा नही मोल लेना चाहतीं। मैंने भी आटो वालों से झगड़ा करना बहुत पहले छोड़ दिया है।

चलूं, एक आटो वाले से पूछूं कि जहां वह जा रहा है, मुझे भी वहीं जाना है, क्या वह मुझे ले चलेगा।

ज्ञान वाया सीएनजी

भारतीय ज्ञान से प्रभावित होकर वह विदेशी इंडिया आया था, बोला मैं धैर्य, संयम, त्याग, कंसट्रेशन, जिजिविषा, लगातार संघर्ष क्षमता, सहनशीलता, प्रेम, ध्यान, समस्याओं को नये तरह से निपटाने की कला, प्रात जल्दी उठने की आदत सीखना चाहता हूं, प्लीज बताइए,कहां जाऊं।

मैंने बताया-दिल्ली में किसी भी सीएनजी स्टेशन पर जाकर लाइन में लग जाओ।

वह चकरा गया, उसे उम्मीद थी कि मैं किसी आश्रम का पता बताऊंगा।

मैंने बताया-जी अब ज्ञान के नये सेंटर डेवलप हो गये हैं। दिल्ली में सीएनजी स्टेशन उनमें शामिल हैं।

विदेशी लग लिया कार लेकर सीएनजी स्टेशन पर।

दोपहर में लगा था लाइन में, आधी रात से ज्यादा हो ली थी।

विदेशी घबरा गया और बोला-इत्ती देर में मैं फ्रैकफुर्त से दिल्ली आ लिया था।

मैंने बताया-धैर्य मित्र धैर्य। फ्रैंकफुर्त से दिल्ली पहुंचना बहुत आसान है, पर सीएनजी स्टेशन के बाहर से अंदर पहुंचना मुश्किल काम है। धैर्य की शिक्षा मिली या नहीं।

विदेशी गिर सा लिया। धैर्य पर्याप्त मात्रा में उसके अंदर घुस चुका था।

तब ही एक पुलिस वाले की रिकमंडेशन लेकर एक कार वाला लाइन तोड़कर सीधे अंदर जाने को उन्मुख हुआ।

विदेशी ने आपत्ति की।

मैंने समझाया-यही रीत है यहां। त्याग अपने नंबर को त्याग, उन्हे जगह दो।

त्याग का पाठ भी विदेशी पढ़ चुका था।

आधी रात के बाद विदेशी सो गया।

पीछे से कई हार्न बज उठे।

कंसट्रेशन, कंसट्रेशन से जगे रहो, और सीएनजी पर निगाह रखो।

मैं स्पेस राकेट उड़ाता हूं, उस काम में भी इत्ते कंसट्रेशन की जरुरत ना पड़ती, जितनी इस काम में पड़ रही है-विदेशी घबरा उठा।

मैंने समझाया कि मंगल ग्रह के रास्ते पर राकेट उड़ाना आसान है, पर दिल्ली में सीएनजी स्टेशन से सीएनजी भरवाना उतना आसान नहीं है। कंसट्रेशन, फुल कंसट्रेशन की जरुरत है।

इत्ते में पीछे से किसी बेसब्रे ने अपनी गाड़ी विदेशी की गाड़ी में घुसा दी।

कूल,कूल ऐसे मामलों में विकट संघर्ष क्षमता की जरुरत होती है। आप आगे की गाड़ी में घुसा दो, इस तरह से परस्पर संघर्ष होता रहेगा, टाइम भी पास होता रहेगा। संघर्ष क्षमता डेवलप हो जायेगी।

बीस घंटे हो चुके थे, विदेशी ने अब कहा-इत्ती देर में हमारे देश में एकाध अफेयर, एकाध शादी और एकाध तलाक हो जाता।

मैंने बताया-हम बैकवर्ड लोग हैं, इत्ती देर में अभी यहां सिर्फ एकाध अफेयर ही हो पाता है।

विदेशी अब की बार खुद ही बोला- प्रेम के डेवलप होने का एकदम ठीक ठिकाना सीएनजी स्टेशन ही है।

सीएनजी की समस्या इतनी है यहां तो पहले सीएनजी का जुगाड़ करना चाहिए था, फिर सीएनजी के व्हीकल चलाने चाहिए थे-विदेशी बड़बड़ाने लगा।

देखो इस कहते हैं समस्याओँ को नये तरीके से निपटाना। अब कोई सीएनजी की प्राबलम की बात नहीं करता। अब नयी तरह की प्राबलम पैदा हो गयी हैं, सीएनजी स्टेशन के सामने ट्रेफिक जाम हो जाता है। इत्ती लंबी लाइनें परमानेंट सी हो ली हैं, कईयों ने परमानेंट झुग्गियां गाड़ ली हैं। किसी को पता ही नहीं चला। कुछ दिनों में महत्वपूर्ण समस्याएं ये होंगी कि इन झुग्गियों का पुनर्वास कैसे किया जाये या सीएनजी स्टेशन के ऊपर से ट्रेफिक निकालने के लिए फ्लाईओवर कैसे बनाया जाये। समस्या का नये तरह से सोल्यूशन इस तरह से निकाला जाता है कि नयी समस्याओं को खड़ा कर दो।

राइट,एक बात मुझे समझ में आयी है कि मुझे सीएनजी भरवाने के लिए दोपहर में नहीं आना चाहिए। अब से सुबह तीन बजे उठकर सीएनजी भरवाने आऊंगा-विदेशी बोला।

देखा ब्रह्ममुहुर्त में उठने का सबक मिला ना सीएनजी स्टेशन से-मैंने बताया।

विदेशी भी सहमत हो गया है कि भारत में ज्ञान के धांसू केंद्र दिल्ली के सीएनजी स्टेशनों में छिपे हुए हैं।

प्रेम में ट्रांसफार्मर


जिस इलाके में रहता हूं, वहां का ट्रांसफार्मर फुंक गया है, बिजली अठ्ठाईस घंटे से नहीं आ रही है। चेतना में सिर्फ ट्रांसफार्मर घुस गया है।

इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन वाला एक बंदा बता रहा है कि चंद्रयान तीन की तैयारी चल रही है। मैं पूछ रहा हूं कि भईया आसमान में उड़ने वाले यान बना लिये, पर जमीन पर एकाध महीने भी कायदे से चलने वाले ट्रांसफार्मर हम क्यों नहीं बना पाते।

इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गनाइजेशन के बजाय इस इस देश में इंडियन ट्रांसफार्मर रिसर्च आर्गनाइजेशन बनना चाहिए था, तो देश का बहुतै भला होता।

भईया पिछले महीने तो फुंका था।

हां बस एकाध महीना चलता है ट्रांसफार्मर।

नहीं अब तो अच्छी क्वालिटी के बन रहे हैं, कोई कोई ट्रांसफार्मर तो एक महीने दो दिन भी चला है।

ट्रांसफार्मर नया अब कहां से आ रहा है।

कानपुर से।

दिल्ली के इलाकों के आसपास से क्यों नहीं आ सकता ट्रांसफार्मर।

इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है। ट्रांसफार्मर दिल्ली के आसपास से क्यों नहीं आता।

चंद्रयान हरिकोटा से आता है, यह तो समझ में आता है।

पर ट्रांसफार्मर लोकल क्यों नहीं आ सकता।

भईया जी क्या स्कोर रहा आयरलैंड और इंडिया के मैच का।

अबे चुप, सुबह से यहां ट्रांसफार्मर में लगे हैं, कौन फिक्र करे आयरलैंड की।

क्रिकेट में ट्रांसफार्मर घुस गया है। इस देश को क्रिकेट के कुटेव से बचाने के जुगत यह है कि देश में तमाम इलाकों में ट्रांसफार्मर फुंकवा दिये जायें। फिर पब्लिक ट्रांसफार्मर के अलावा कुछ और बात नहीं करेगी।

मिसेज गुप्ता ट्रांसफार्मर वालों को गाली बक रही हैं।

फुंके ट्रांसफार्मर की लोकेशन मिसेज गुप्ता के मकान के सामने थी। कालोनी के ट्रांसफार्मर एक्टिविस्टों ने उनके घर से पानी पीने की जुगाड़ की, मिसेज गुप्ता की बिटिया की बातचीत एक ट्रांसफार्मर एक्टिविस्ट से शुरु हो गयी। बात आगे जम गयी।

मिसेज गुप्ता आजतक ट्रांसफार्मर को गाली देती हैं।

एक टीवी चैनल वाले आये हैं मुझसे राष्ट्रीय पारिवारिक समस्याओं पर बात करने के लिए।

मैं बता रहा हूं-राष्ट्र के सामने सबसे बड़ी समस्या है-ट्रांसफार्मर। अगर ट्रांसफार्मर फुंक जाते हैं, अठ्ठाईस घंटे बिजली नहीं आती है, तो फिर घर में पति पत्नी के बीच एक मात्र संवाद यही होता है कि बिजली कब आयेगी पता नहीं। कलह कलेश के दूसरे मुद्दे ट्रांसफार्मरी बैकग्राऊंड में चले जाते हैं।

रामप्रस्थ कालोनी वाले किलस रहे हैं कि सूर्यनगर का ट्रांसफार्मर डेढ़ महीने चलता है, उनका सिर्फ एक महीने ही चल पाता है।

एक ट्रांसफार्मर एक्टिविस्ट ने ट्रांसफार्मर स्थापित करने का मुहुर्त निकलवाकर ही उसे स्थापित करवाया और उस पर लिखवाया-ओम् ट्रांसफार्मराय प्रसन्न। एक जानकार ने राय दी कि पूर्णिमा को दोपहर बारह बजे का मुहुर्त सही है। दूसरे ने बताया कि शनिवार को लोहे का काम ठीक नहीं है, इसलिए शनिवार इसे स्थापित ना कराया जाये, ट्रांसफार्मर की लंबी उम्र के लिए हम चौबीस घंटे और ट्रांसफार्मर विरह सहन कर लेंगे। ट्रांसफार्मर केंद्र में है।

जिस हिसाब से ट्रांसफार्मर फुंक रहे हैं, उसे देखते हुए लगता है कि बहुत जल्दी ट्रांसफार्मर की दीर्घजीविता के लिए ट्रांसफार्मर कथाएं कही जायेंगी, जिनके वाचन और पारायण से ट्रांसफार्मर के लंबे चलने की संभावना होगी।

चलूं, ट्रांसफार्मर कथा का लेखन शुरु करुं, गर्मी गर्मी धांसू डिमांड रहने की उम्मीद है।

हारे को आत्मचिंतन


विकट आत्मचिंतन मचा हुआ है। इधर भी, उधर भी और उधर भी।

आत्मचिंतन ऐसा आइटम है, जो चुनावों के बाद हारने वाले खेमे में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। वैसे हारने वाले खेमे में एक औऱ तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है-सिर फुट्टौवल। पर यह काम थोड़ा आफ दि रिकार्ड तरीके से होता है।

हालांकि अब इसके आफ दि रिकार्ड होने की कोई जरुरत रह नहीं गयी है। खबरें बाहर आ जाती हैं, अबे तूने उस ठेके में सौ करोड़ बनाये, मैंने सिर्फ दो करोड़ बनाये, फिर हार की जिम्मेदारी मैं क्यों लूं। तू सौ पाइंट जिम्मेदार है, मैं सिर्फ दो पाइंट जिम्मेदार हूं। पब्लिक नासमझ है, इतना पाइंटगत चिंतन नहीं करती, दो पाइंट वाले को भी निपटाती है और सौ पाइंट वाले को भी। फिर भी अब भी चलन सिर फुटौव्वल को परदे के पीछे करने का ही है।

पर आत्मचिंतन बाकायदा इश्तिहार देकर होता है। शिविर में होता है। समूह में होता है। अकेले में होता, दो मिलकर करते हैं। गोष्ठियों में होता है। जीतने वाला लंच करता है, डिनर करता है, यानी सब प्रकार से खाने का जुगाड़ करता है। पर हारने वाला हर तरह से सिर्फ आत्मचिंतन करता है। हारे को हरिनाम पुरानी बात है, अब नयी बात है -हारे को आत्मचिंतन।

हारने के बाद के आत्मचिंतन में विकट तथ्य सामने आते हैं-अरे हारे तो हम दोनों ही थे, पर उसे वह वाली टाप पोस्ट मिल गयी। और मैं कहीं भी नहीं हूं। अरे वह तो मेरे से भी ज्यादा निकम्मा था, फिर उसे वह वाली पोस्ट दे दी गयी। हाय, आत्मचिंतन का रिजल्ट यह होता है कि बंदा आत्म के बारे में और गहराई से सोचने लगता है। जबकि उम्मीद यह की जाती है कि वह राष्ट्र निर्माण में आत्म के योगदान के बारे में सोचेगा।

पहले हारने के बाद नेता शर्म ओढ़ते थे, अब आत्मचिंतन ओढ़ते हैं। पहले के नेता के बारे में माना जाता था कि चिंतन तो वह रोज ही करता होगा। पर अबके नेता के बारे में माना जाता है कि यह काम हारने के बाद ही शोभा देता है। जीता नेता के चिंतन में नयी पोस्ट, नया पोर्टफोलियो, नये चमचों की सैटिंग, पुराने चमचों का पुनर्वास आदि होता है, इनके परिणाम पांच साल बाद आते हैं, तब आत्मचिंतन होता है।

खैर, आत्मचिंतन में डूबे एक नेता से मैंने कहा-प्यारे आत्मचिंतन ही कर रहे थे हारने से पहले। सारे पेट्रोल पंप अपने भाइयों को दे दिये, सारी गैस एजेंसियां अपने दामादों को दे दीं। सारे कायदे के प्लाट अपने भतीजों के हवाले कर दिया। आत्मचिंतन के अलावा तुमने किया क्या था, कार्यकर्ता बुरा मान गये, उनका चिंतन नहीं किया। कार्यकर्ता चिंतन किया होता, तो आत्मचिंतन की नौबत नहीं आती।

नेता मुस्कुराया और बोला- अब वक्त है जब हम सोचें कि हमने क्या किया।

पर जो किया, अगर वो सच्ची में बताने लग जाओगे, तो ज्यादा बड़ी दिक्कत हो जायेगी। पांच सालों में पचास विदेश यात्राएं।

ये विकट दिक्कत है आत्मचिंतन की, ऐसी ऐसी बातें सामने आती हैं कि सबको बतायी नहीं जा सकतीं। सो पब्लिक को बताने के लिए सिर्फ यह बचता है कि हमने काम तो बहुत किये थे, पर पब्लिक तक उन सबको पहुंचा नहीं सके। पब्लिक को बता नहीं सके।

पर इसका इस तथ्य पर कोई असर नहीं पड़ता कि वे अभी अभी आत्मचिंतन में लगे हैं, अभी अभी सिर फुट्टौवल से आये हैं।

प्रति व्यक्ति गढ्ढे


विकट आंकड़े आ रहे हैं प्रति व्यक्ति आय बढ़कर तीन हजार रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह से ज्यादा हो गयी है।

मेरे हिस्से के तीन हजार मुझे नहीं मिले-एक इकोनोमिक एक्सपर्ट से मैंने पूछा।

उसने बताया-हमारा काम सिर्फ यह बताना है कि तीन हजार रुपये प्रति माह तुम्हारे हिस्से के हैं। ये कहां से मिलेंगे या तुम्हारे हिस्से के कौन ले गया है, यह बताना हमारा काम नहीं है।

यह और भी विकट समस्या है,एक्सपर्ट बता कर निकल जाता है कि प्रति व्यक्ति के हिस्से में इत्ती रकम आ रही है या इत्ते टेलीफोन आ रहे हैं, पर ये मिलेंगे कहां, यह कोई नहीं बताता।

मेरे हिस्से की आय वो वाला ठेकेदार ले गया है, मुझे पता है।

मेरे हिस्से की आय वो वाला नेता ले गया है, मुझे पता है।

पर यह नहीं पता कि उससे अपना हिस्सा कैसे वसूलूं। ऐसी बातें बताने वाले एक्सपर्ट कहीं नहीं पाये जाते।

प्रति व्यक्ति आय उस नेता की बढ़ गयी है, पर उनका क्या, जिनकी नौकरी छंटनी में चली गयी है।

प्रति व्यक्ति सड़क इंडिया में इत्ते किलोमीटर हो गयी है-दूसरा इकोनोमिक एक्सपर्ट बता रहा है।

सड़क किन्ही और के हिस्से में आ रही हैं, मेरे मुहल्ले में प्रति व्यक्ति गढ्ढों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।

टाप क्लास नेताओँ के आसपास की सड़कों में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है।

कई नेताओँ के शापिंग माल भी बन गये हैं। प्रति नेता शापिंग माल तेजी से बढ़े हैं।

पर मेरे हिस्से में गढ्ढे आये हैं। इनका हिसाब कोई एक्सपर्ट नहीं रखता।

साफ तौर पर यह बताया जाना चाहिए कि शहर के नेताई हिस्से में प्रति व्यक्ति सड़क, प्रति व्यक्ति पानी और प्रति व्यक्ति बिजली में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। पर जहां पब्लिक रहती है, वहां प्रति व्यक्ति गढ्ढे दस से बढ़कर सौ हो लिये हैं।

उधर एक एक्सपर्ट कह रहा है कि रिकवरी शुरु हो गयी है।

इस भाई की मंदी खत्म हो गयी है, मंदी की स्टडी करने के लिए पांच लाख मिल गये इसलिए। जिन्हे मंदी की स्टडी करने काबिल नहीं माना गया, उनकी मंदी कैसे दूर होगी। इस सवाल का जवाब किसी एक्सपर्ट के पास नहीं है।

एक और एक्सपर्ट कारों की बढ़ी बिक्री के आंकड़े दिखाकर बता रहा है कि रिकवरी शुरु हो गयी है। भईया तेरी छोटी कार से बड़ी कार हो गयी है, पर जो नौकरी खोकर बाइक से उतर कर पैदल हो गये, उनका क्या।

जी हम सिर्फ कारों की बिक्री से मंदी माप रहे हैं-एक्सपर्ट बता रहा है।

अब बात तो यह भी सही है कि अगर आप बड़ी कार वाले नहीं हैं, एक्सपर्ट नहीं हैं, नेता नहीं हैं, तो ये मंदी आपकी पर्सनल प्राबलम है। कोई इसमें क्या कर सकता है।