प्रोफेसर जरदारी का सेल्स मैनेजमेंट

चुपके से देखा मैंने, उस बिल्डिंग में कई कंपनियों की सेल्समैनों की ट्रेनिंग चल रही थी। टेलीकाम कंपनियां, टीशर्ट कंपनियां, जूता कंपनियां, टीवी कंपनियां, तरह तरह की कंपनियां अपने सेल्समैनों को ट्रेनिंग दिलवा रही थीं। ट्रेनिंग देने वाले प्रोफेसर थे पाकिस्तान के प्रेसीडेंट जरदारी,पाकिस्तान के प्रधानमंत्री प्रोफेसर गिलानी और पाकिस्तान की सूचना मंत्री शैरी रहमान। ट्रेनिंग कुछ यूं चल रही थी।

टेलीकाम सेवा के सेल्समैन का सवाल-देखिये हम सिम कार्ड बेच देते हैं। फिर बिल में सौ दो सौ भी फालतू लगा के भेज दें, तो ग्राहक चाऊँ चाऊँ करता है। हम ग्राहकों से बिना पूछे ही उनकी स्पेशल फोटू सप्लाई सर्विस एक्टिवेट करके पांच सौ रुपये बिल में बढ़ा देते हैं, इस पर भी ग्राहक हल्ला करता है। बताइए ऐसा कैसे हो, कि हम उसकी जेब काट लें, और वह हल्ला भी ना करे।

प्रोफेसर जरदारी-देखिये, जब भी वह कहे कि आपने उसके बिल में दो सौ चार सौ बढ़ा दिये, तो आप कहिये कि सबूत क्या है। पक्के सबूत बतायें कि चार सौ छह सौ रुपये बढ़ा दिये गये हैं।
टेलीकाम सेल्समैन-पर जी सबूत तो होता है, बिल में लिखा होता है।

प्रोफेसर जरदारी-ये अच्छे सेल्समैन के लक्षण नहीं हैं। लिखे होने से कुछ नहीं ना होता। लिखने को लिखा है कि पाकिस्तान में डेमोक्रेसी है, पर कोई मानता है क्या। आप तो सबूत मांगिये। आप कहिये कि ये हमारी कंपनी के कुछ एलिमेंट्स का काम हो सकता है, पर हम उनकी जिम्मेदारी नहीं लेते।
टेलीकाम सेल्समैन-देखिये, पाकिस्तान को इस तरह से चलाया जा सकता है, पर टेलीकाम कंपनी ऐसे कैसे चल सकती है।

प्रोफेसर रहमान शैरी पाकिस्तान की सूचना मंत्री-देखिये, सबूत मांगने के फौरन बाद कहिये कि ग्राहक तुझे मुंहतोड़ जवाब दिया जायेगा। तू हमारी तरफ आंखें उठाकर देखेगा,तो न्यूक्लियर बम चला देंगे।
टेलीकाम सेल्समैन-पर हम ऐसा कह सकते हैं, यह तो इशू ही नहीं है। इशू तो जेब काटने का है।

प्रोफेसर रहमान शैरी-ऐसे ही टेकल किया जाता है। हम तो दिन में चार बार परमाणु बम डालने के बयान देते रहते हैं। आप फिर कस्टमर को गाली देना शुरु कर दीजिये।
टेलीकाम सेल्समैन-इससे तो टेंशन बढ़ जायेगा।

प्रोफेसर जरदारी-राइट, ये ही है राइट चाइस बेबी आहा। बोले तो फिर आप कहिये, टेंशन कम कीजिये। इशू अब टेंशन कम करने का है। सबको मिलकर टेंशन कम करना है, और इसके लिए जरुरी है कि हम पुरानी पोजीशन पर आयें। और पुरानी पोजीशन मतलब कस्टमर बढ़े हुए बिल का भुगतान कर दे, और हम उसे मंजूर कर लें।
टेलीकाम सेल्समैन-देखिये, आप जिस तरह से पाकिस्तान चला रहे हैं, उस तरीके से टेलीकाम कंपनी नहीं चल सकती।

प्रोफेसर जरदारी-देखिये,मैं कुछ चलाने के लिए नहीं, आपको झूठ की ट्रेनिंग देने आया हूं।
अब बताइए, इसके आगे प्रोफेसर जरदारी से क्या पूछा जा सकता है।

आत्माओँ की धुआंधार ड्रेस

हैप्पी न्यू ईयर कहना बेकार है, इसलिए कि बंदा आज की तारीख में खुदै ही कनफर्म नहीं है कि हैप्पी होगा या नहीं। आलू के भाव इस साल भी उस लेवल पर नहीं जायेंगे, किसी आलू वाले ने आश्वस्त नहीं किया है, सो फिर काहे हैप्पी हो लें जी। हैप्पीनेस अब आलू वालों, प्याज वालों के एक्शन में निहित है। बची खुची हैप्पीनेस का ठेका पाकिस्तान के पास है।

ऐसे में भी जिसका बूता हो, वह हैप्पी हो जाये।

साल के पहले दिन कई तरह के ज्ञान हासिल किये हैं। बमबाजी के इस माहौल में यह प्रवचन फुल जोरदारी से समझ में आ गया है कि आत्मा अजर अमर है, शरीर तो चोला है। थैंक्स टू बम, कसब, जरदारी, आत्मा को नयी ड्रेस बहुत जल्दी जल्दी मिलने का जुगाड़ हो लिया है। जैसे हो सकता है कि यह खाकसार अभी दिल्ली में टें बोले, फिर कल नये चोले में मुंबई में आये, वहां भी बमों में नया चोला मिल जाये। इस हिसाब से देखें, तो आत्माएं बहुत खुश होंगी, इन दिनों धुआंधार नयी ड्रेस मिलने का सीजन है।

आत्माओँ की बातचीत इस प्रकार होती होगी आजकल-
क्यूं री कल ही तू गयी थी, नयी ड्रेस पहनकर,रात में फिर वापस आ ली।

हां री कसब, जरदारी, गिलानी वगैरह बहुत ओवरटाइम कर रहे हैं। मेरे साथ वाली आत्मा को तो दो दिन में पांच नयी ड्रेसें मिल गयीं।
रीयली, भई नयी ड्रेसबाजी में ऐसी मौज तो कभी ना हुई आत्माओं की।

आत्माएं एक दूसरे की नयी ड्रेस को न्यू पिंच करके आगे चली जाती होंगी।
हैप्पी हो लीजिये, अगर बूता है, बावजूद इस फेक्ट के कि नौकरियां जा रही हैं। बीस हजार का बंदा निकालकर कंपनियां दोगुना काम कराने के लिए दस हजार रुपये का बंदा रख रही हैं। जिसकी नौकरी गयी है, उसे समझ में आ रहा है-जो आज तेरा था, वह कल किसी और का होगा। उसके बाद के कल को किसी को और का होगा। जो नौकरियां अमेरिकनों की थी, वह सस्ती आउटसोर्सिंग के हल्ले में गुड़गांव वालों की हो गयीं, अब और सस्ते के चक्कर में चीन की हो जायेंगी।

जो कार तूने लोन पर ली थी, वह पहले शो रुम वाले की थी, अब लोन ना चुकाने पाने की वजह से पहलवान लोगों की हो जायेगी।

यहां पक्का कुछ नहीं है, (पाकिस्तान की बेईमानी और बुश की बेवकूफी को छोड़कर)। यह फंडा जिसकी समझ में आ गया, उसे नौकरी और कार जाने के मामले में कष्ट में नहीं होता।

खैर चलिए, हैप्पी 2009, अगर हो सकते हैं, तो हो जाईये।

संडे यूं ही-डरना जरुरी है

वैधानिक चेतावनी-यह व्यंग्य नहीं है

2008 का सीन भारत के लिए मिक्स्ड ही माना जायेगा, अर्थव्यवस्था संकट में तो आयी, पर उतने संकट में नहीं, जिसमें विश्व की बड़ी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं दिखायी पड़ रही हैं। यानी संकट में, मंदी में भी यह माना जा रहा है कि 2008-09 में भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास दर सात फीसदी तो रहेगी ही। मंदी के दौर की यह विकास दर भी उपलब्धि से कम नहीं है। 2008 ने यह बता दिया है कि ग्लोबलाइजेशन की प्रक्रिया के अपनी समस्याएं हैं। उनसे निपटने की लोकल तैयारियां अगर ना हों, तो ग्लोबलाइजेशन पूरी अर्थव्यवस्था को डुबो सकता है।

2008 की पूरी ग्लोबल वित्तीय उथल पुथल में भारतीय बैंक समस्या में क्यों नहीं आये। इस सवाल के जवाब में एक वरिष्ठ बैंक अधिकारी ने जो जवाब दिया है, वह दरअसल पूरी समस्या और इसके भविष्य के सूत्र को समझने में मदद करता है। इस अधिकारी ने बताया कि भारतीय बैंकिंग का करीब सत्तर प्रतिशत तो सरकारी बैंकों के हाथ में है। सरकारी बैंकों से कर्ज लेना बहुत मुश्किल काम है आम तौर पर। जब कर्ज मिलेगा ही नहीं, तो डूबने का तो सीन ही बनता। रकम डूबी नहीं, तो भारतीय बैंकिंग जगत के अधिकांश हिस्से के लिए समस्या का सवाल ही पैदा नहीं हुआ।

सरकारी बैंक कर्ज देने में आम तौर पर अतिरिक्त सावधानी बरतते हैं। यह अतिरिक्त सावधानी कितनी कीमती होती है, यह हाल के घटनाक्रम में साफ हो गयी है। जिन अमेरिकी बैंकों की कर्ज देने की तत्परता को बहुत ही ग्राहक फ्रेंडली बताया जाता है, उनमें से अधिकांश इतिहास के कूड़ेदान में चले गये हैं। बैंकिंग जगत में विश्वव्यापी तबाही के बावजूद भारतीय बैंकों की स्थिति मजबूत रही, इससे पूरे विश्व को एक महत्वपूर्ण संदेश यह जाता है, कि आर्थिक मामलों में, वित्तीय मामलों में डरना जरुरी है। पूरी अमेरिकन संकट दरअसल बैंकों , वित्तीय संस्थानों की आक्रामक मूर्खता और उन्हे नियंत्रित करने वाली संस्थाओं की अदूरदर्शिताओं की कहानी ही कहता है।

भारतीय बैंकों, वित्तीय संस्थानोँ को धुआंधार कर्ज बांटने में डरना चाहिए, यह बात एक बार फिर साफ हो गयी है। तेजी के वक्त में तो हर तरह के संस्थान मुनाफा कमा लेते हैं, यह तो संकट के समय ही पता चलता है कि प्रबंधन का स्तर कहां पर कैसा है।

2008 के सबक साफ हैं कि वित्तीय संस्थानों के लिए डरना जरुरी है और उनकी नियामक संस्थाओं को भी डरना चाहिए और इस डर के हिसाब से कदम उठाने चाहिए। 2008 का एक सबक साफ यह है कि लगातार उधारी पर अर्थव्यवस्थाएं नहीं चल सकतीं। अमेरिकन अर्थव्यवस्था विकट उधारखाऊ अर्थव्यवस्था है। मोटे तौर पर वहां सकल घरेलू उत्पाद के तीन गुने से भी ज्यादा का कर्ज लदा हुआ है। इस संकट ने बताया है कि उधार का इस्तेमाल अगर उत्पादक कामों में नहीं हो रहा है, तो रिजल्ट परेशानी वाले होते हैं। भारत में क्रेडिट कार्ड कारोबार हाल तक चालीस प्रतिशत सालाना की रफ्तार से बढ़ता रहा है। अमेरिका से सीखने का सबक यह है कि उधार मिलना आसान नहीं होना चाहिए।

एक और महत्वपूर्ण सबक उदारीकृत अर्थव्यवस्थाओं के फायदे उठाने वालों के लिये यह भी है कि लाभ हानि खाते में हानि का भी कालम होता है और बैलेंस शीट में सपत्ति के साथ दायित्वों का भी कालम होता है। उदारीकृत होती अर्थव्यवस्था में जब कंपनियों का कारोबार फैल रहा था, नये रोजगार पैदा हो रहे थे। बैंकिंग,आटो, उड्डयन,बीपीओ, साफ्टवेयर में लोगों के वेतन हर साल दो गुने हो रहे थे। तब उदारीकृत अर्थव्यवस्था के फायदे सबको नजर आ रहे थे। पर अब यह भी उसी व्यवस्था का एक पक्ष है कि जब मुनाफे सिकुड़ चुके हैं, कारोबार मंदी की गिरफ्त में हैं, तब नौकरियां जायेंगी। जेट एयरवेज से निकाली गयी एयरहोस्टेस और एयरहोस्टों के परेशान हाल चेहरे दरअसल 2008 की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक इमेज हैं।

2008 ने बताया है कि जिन सेक्टरों को भारतीय अर्थव्यवस्था का स्टार सेक्टर बताया जा रहा था, उनके सितारे गर्दिश में आ गये हैं। बीपीओ, साफ्टवेयर, आटोमोबाइल ये उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था के स्टार सेक्टर रहे हैं। पर ग्लोबल मंदी के असर इन उद्योगों पर दिखायी दिये हैं। देश की सबसे बड़ी ट्रक निर्माता कंपनी टाटा मोटर्स का सितंबर 2007 में खत्म हुई तिमाही में शुद्ध मुनाफा था-526.84 करोड़ रुपये, एक साल बाद यानी सितंबर 2008 में खत्म हुई तिमाही में यह घटकर रह गया-346.99 करोड़ रुपये। एक साल की अवधि में शुद्ध मुनाफे में करीब 34 प्रतिशत की गिरावट आ गयी।

ट्रक नहीं बिक रहे हैं, क्योंकि ट्रक खरीदने वालों की दिलचस्पी कम हो गयी है। ट्रक खरीदने वालों की दिलचस्पी इसलिए कम हो गयी है कि पहले ही खरीदे गये ट्रकों की ईएमआई चुकाना मुश्किल हो रहा है। नये ट्रकों के लिए कारोबार नहीं है। जब पुराना ही माल स्टाक में हो, तो नये माल को मंगाने की जरुरत क्या है। कुल मिलाकर टाटा मोटर्स के आंकड़े सिर्फ इस कंपनी की नहीं, समूची अर्थव्यवस्था की कहानी कहते हैं। कारों की सबसे बड़ी कंपनी मारुति का सितंबर, 07 को खत्म हुई तिमाही में शुद्ध लाभ था-466.50 करोड़ रुपये, यह सितंबर 08 की मंदीग्रस्त तिमाही में गिरकर रह गया 296.12 करोड़ रुपये यानी करीब 37 प्रतिशत की गिरावट।

इस सबके बावजूद तमाम सकारात्मक तथ्य भारतीय अर्थव्यवस्था के पक्ष में खड़े हैं। मंदी के इस दौर में भी हर महीने एक करोड़ नये मोबाइलधारक मोबाइल जनसंख्या में जुड़ रहे हैं। निजी क्षेत्र के बेहद आक्रामक माने जाने वाले बैंक भी अब उधार देने में संयम बरतना सीख रहे हैं। थोक मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई लगातार कम होती दिख रही है। अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में तेल के भाव कमजोर होते दिख रहे हैं। पर इन सारे कारकों के बावजूद शेयर निवेशकों को 21,000 के सेनसेक्स के लिए लंबा इंतजार करना पड़ेगा, यह आंकड़ा 2009 में तो आता नहीं दिखता। दरअसल शेयर बाजार मोटे तौर पर अब 2005 के लेवल पर हैं, जब विदेशी संस्थागत निवेशकों ने जमकर खरीदारी शुरु की थी। अब चूंकि विदेशी संस्थागत निवेशकों की दिलचस्पी भारतीय बाजारों में कई कारणों से कम हो गयी है, तो बाजार पुन 2005 वाली गति की ओर उन्मुख हो गये हैं।

कुल मिलाकर 2009 के लिए संदेश यही है निवेशकों के लिए, उपभोक्ताओँ के लिए, उधार देने वालों के लिए, उधार लेने वालों के लिए, नियामक संस्थाओँ के लिए कि डरना जरुरी है। और 2009 में डरने की वजहें कम होने के आसार नहीं हैं, क्योंकि अब भारत जैसी अर्थव्यवस्था काफी हद ग्लोबल कारकों से जुड़ चुकी है। अमेरिका की जो गति हो गयी है और यूरोप की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जिस गति से गुजर रही हैं, उनमें निकट भविष्य में सुधार की कोई संभावना नहीं है।

डर और इंतजार 2009 के केंद्रीय भाव रहेगे।

खुश होईये उर्फ हैप्पी बेरोजगारी..

बधाई च शुभकामनाएं कि आप सब 2009 में हैं, क्योंकि…
1 अगर आप बिहार में हैं, तो बाढ़ में डूब सकते थे, महाराष्ट्र में हैं, तो ताज होटल के धमाके में हो सकते थे, दिल्ली में हैं तो खान मार्केट या कनाट प्लेस या कहीं भी हो सकते थे। सरकारों के निकम्पेपन और आतंकवादियों के फुल एक्शन के बावजूद आपने 2009 देखा, इस बात के लिए खुद को बधाई दें। कई बार सिर्फ सांस लेने काबिल बने रहना सबसे बड़ी उपलब्धि होता है।

2-खुश होईये कि इस टाइम आप गाजा पट्टी में नहीं हैं, वरना इजराइल के बम आपको मार सकते थे। खुश होने के ये नये तरीके हैं कि आपका हाल जितना खऱाब है, उससे ज्यादा कहीं हो सकता था। इस तरह से सोचिये, तो सब तरफ से खुशी बरसने लगेगी। खुश होईये कि आपके यहां सिर्फ बीस घंटे लाइट गायब है, गाजा पट्टी में लाइट तो छोड़ो, लाइफ ही गायब है। हैप्पी होने के लिए, अब गाजा पट्टी की ओर देखिये।

3-हैप्पी न्यू ईयर मत बोलिये, क्योंकि किसी को हैप्पी बनाना या ना बनाना आपके हाथ में नहीं है, वह कसाब, जरदारी, मुशर्रफ, गिलानी जैसों के हाथ में भी है। ये किनके हाथ में हैं, इस बारे में कुछ कहना मुश्किल है। ये तालिबानियों के हाथ में भी हैं और अमेरिकनों के हाथ में भी। लश्करे तोईबा के हाथ में भी है और आईएसआई के हाथ में भी। हाथ किसका किस पर है, यह कनफ्यूजन है। इस इंटरनेशनल कनफ्यूजन में अपनी घरेलू हैप्पीनेस को लेकर एकैदम कनफर्म मत होईये।

4-खुश मत होईये, अगर पीडब्लूडी विभाग यूपी में हैं और इंजीनियर हैं।

5-और बहुत ही खुश होईये, अगर आपकी नौकरी पीडब्लूडी में नहीं है। या यूपी में कहीं नहीं है। बेरोजगारी के कितने फायदे हैं, इस पर सोचिये। बेरोजगार से कोई विधायक वसूली नहीं करता। बेरोजगार से पुलिस वाला भी हफ्ता नहीं वसूलता। बेरोजगार को दफ्तर में लोकल, बस से नहीं जाना पड़ता, कनाट प्लेस नहीं जाना पड़ता, किसी होटल में किसी मीटिंग के लिए नहीं जाना पड़ता, कुल मिलाकर किसी बमबाजी के सीन का सामना नहीं करना पड़ता। इस तरह से कुल मिलाकर बेरोजगारों के जिंदा रहने के चांस रोजगार वालों से ज्यादा हैं, खास तौर पर यूपी में। बेरोजगार बने और लाखों पाये टाइप नयी कहावत गढ़िये और चैन से बेरोजगार रहिये।

6-आईये, साल की शुरुआत हैप्पी बेरोजगारी से करें।

फ्लैक्सिबल अखंडता

सिचुएशन नार्मल सी हो ली है, मतलब पुराने कनफ्यूजन के दिन लौट आये हैं।
कनफ्यूजन है कि आतंकवाद से कड़ाई से निपटने का मतलब भारतीय नेताओँ के कड़े
और बहुत बड़े बयान हैं या जिस दिन अमेरिकन विदेश मंत्री कोंडालीजा राइज बयान दें, उसी दिन फुल कड़ाई मानी जाये, बाकी दिन की लड़ाई कुछ कम कड़ाई के खाते में दर्ज हो जाये।

आतंकवाद से कड़ाई से निपटा जायेगा, इस बयान पर अब पब्लिक मुस्कुराने लगी हैं, यह नार्मलत्व के लक्षण हैं। बीच में ऐसे बयानों को फुल सीरियसली लिया जाने लगा था।
पाकिस्तान भी नार्मलत्व की तरफ तेजी से जा रहा है। अब नवाज शरीफ भी कहने लगे हैं कि मुंबई हमलों के हमलावर कसाब के पाकिस्तानी होने का आऱोप भारत ना लगाये।

जब नवाज शरीफ ने कहा था कि कसाब पाकिस्तानी है, तो पाकिस्तान सरकार ने कहा था कि सारे पाकिस्तानी नेताओँ को ऐसे वक्त एकजुट रहना चाहिए। यानी सब हिलमिलकर नार्मल झूठ बोलें, नवाज शऱीफ ने पाकिस्तान सरकार के इस नार्मल आग्रह को स्वीकार कर लिया ।
महत्वपूर्ण पाकिस्तानी नेताओं के बयान झूठे ना लगें, तो समझिये कि नार्मल नहीं हैं।

उधर अमेरिका अपने मसलों के लिए तो पाकिस्तान में मिसाइल गिरा रहा है, और मुंबई के मसलों पर पाकिस्तान को समझा रहा है।

बड़ा विकट सीन होता होगा-जब पाकिस्तान में पेशावर के पास मिसाइल गिराने के बाद अमेरिका कहता होगा, पाकिस्तान से, कि यह मिसाइल हमारे मामले के लिए है। पर मुंबई के मसलों पर हम शांति चाहते हैं। हमारा शांति का बयान आज भी लागू रहेगा, पर सिर्फ मुंबई के मामलों के लिए।

अमेरिका बम गिराता है, पाकिस्तानी सीमा के अंदर, तो पाकिस्तानी एकता अखंडता बनी रहती है। इंडिया की तरफ से कुछ भी नहीं होता, तो भी पाकिस्तानी बयान आ जाते हैं कि जवाब दिया जायेगा। पाकिस्तान की एकता और अखंडता फ्लैक्सिबल है, अमेरिकन बमों में अखंडित रहती है। पाकिस्तानी नेता पूछ लेते होंगे, भई कहां के बम गिरे, अमेरिका के, ओ के, आज भी एकता अखंडता बनी रही। डालर गिराकर बम गिराने का हक सिर्फ अमेरिका को हासिल है।

एक अमेरिकन फिल्म में एक अमेरिकन सुंदरी का एक डायलाग याद आ रहा है -अगर तुम्हारे पास एक लाख डालर हैं, तो ठीक, वरना मुझे एकदम अखंड सच्चरित्र और शरीफ ही मानो।

फ्लैक्सिबल पाकिस्तानी अखंडता का कंसेप्ट मुझे इस अमेरिकी डायलाग ने समझाया है। यूं ही पाकिस्तान और अमेरिका करीब नहीं समझे जाते।

खैर, यह अमेरिका के लिए भी नार्मल है, औऱ पाकिस्तान के लिए भी।