प्रीपेड श्रद्धांजलि …
किसी के मरने के बाद शोक प्रदर्शन का कारोबार विकट मुश्किल काम है। मतलब कई बार झेलना मुश्किल हो जाता है, पर झेलने से इनकार दें, तो ज्यादा मुश्किल हो जाती है।
एक साहित्यकार की मृत्यु के उपरांत शोक श्रद्धांजलि सभा में एक कवियित्री भावुक होकर बोले जा रही थीं-उनके दरवाजे हर नये रचनाकार के लिए खुले रहते थे। हर नये कवि का खुली बांहों से स्वागत करते थे।
अब मेरा मन किया है, खड़े होकर कहूं कि हर कवि के लिए नहीं, हर कवियित्री के लिए। नवोदित कवियित्रियों का वह खुली बांहों से स्वागत करते थे।
पर यह कह देता, तो मेरी ही शोक सभा का इंतजाम हो जाता वहां।
मरने के बाद का प्रोटोकोल विकट है।
मेरे सामने परिवार में एक साठ वर्षीय बुजुर्ग नहीं रहे।
मिलने वाले आते थे, और पूछते थे-क्या उम्र थी।
साठ साल।
हूं, चेहरे पर दुख का इंडेक्स एकदम से गिर जाता था।
जैसे साठ का बंदा टें बोला, तो ठीक बोला। अगर ना बोलता, तो ठीक ना होता। दिल में कुछ इसी टाइप का होता है। मतलब एकाध बार तो यूं हो लिया कि मैंने पूछा- क्या उम्र थी। बताया गया साठ साल। मैं फिर भी चलन के हिसाब से दुखी सा हो लिया। तो परिजनों ने ही मुझे समझाना शुरु किया, नहीं ऐसी दुख की बात नहीं है। मतलब बुजुर्गवार ने अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर ली थीं। बेटियों की शादी कर ली थी। प्रापर्टी बांट बूंट दी थी, जिसके बाद कोई भी लड़का उन्हे अपने साथ रखने को तैयार नहीं था। मतलब बुजुर्ग नहीं रहे, यह उनके हक में ही हुआ और उनसे ज्यादा हमारे हक में हुआ, सो आप गम ना करें, टाइप।
जैसा हिसाब किताब हो गया, मुझे लगता है कुछ दिनों में यह हो लेगा कि कोई बंदा किसी से मिलने जनकपुरी गया है, तो वहां पर अपने एक साठ वर्षीय परिचित के पास भी जायेगा। और कहेगा-और कैसे हैं। अरे हम यहां से गुजर रहे थे, सोचा कि आपकी मातमपुर्सी करते चलें। जी कोई बात नहीं, फिर कभी अगली बार आयेंगे, तो चेक कर जायेंगे।
बल्कि इधर एक विकट पंगा अमेरिका वाले मामा और कनाडा वाला चाचा का भी हो लिया है।
अभी मार्च में एक अमेरिका वाला चाचा पिताजी को निपटाकर गये। जाते ही फिर माताजी की खबर आ ली। बड़ी दिक्कत हुई बार बार आने में।
कुछ दिनों बाद यह होगा कि कनाडा रिटर्न्ड मामाजी पिताजी को निपटायेंगे। फिर बड़ी हसरतों से माताजी को भी देखेंगे, प्लीज जल्दी निपट लो। ऐसा ना हो, कि एक महीने बाद फिर आना पड़े।
या जल्दी कुछ इस तरह के पैकेज डेवलप हो जायेंगे कि मां का निपटारा जीते जी कर दें। प्रीपेड मोबाइल की तरह प्रीपेड क्रिया कर्म सा हो ले। मतलब मामाजी अपने हाथों से माताजी का संस्कार वगैरह कर दें, पंडितजी दक्षिणा वगैरह ले लें। एक दो साल बाद जब माताजी जायें, तो तब एडजस्टमेंट हो जाये। प्री पेड क्रिया कर्म –दो के साथ दो फ्री टाइप, फैमिली पैकेज पर स्पेशल डिस्काऊंट, जल्दी ही इस तरह के पैकेज भी सामने आने लगेंगे। प्री पेड में तो बंदा खुद ही अपना इंतजाम कर सकता है।
अपनी आंखों के सामने ही सब कुछ कर जाये। बाद में कहां पकड़ धकड़ होगी। इंडिया में अभी आंख के सामने की शर्म तो बाकी है। जैसे मैं अगर टें बोल जाऊँ तो बाद का किसी का भरोसा नहीं है। लेखक पत्रकार का तो बिलकुल नहीं है। प्री पेड श्रद्धांजलि सभा में तो मैं खुद ही फोन करके लोगों को हड़का सकता हूं-अबे भूल गया, जब तेरे पिताजी गये थे, तो मैं ही सबसे पहले पहुंचा था। और आज तू मेरी ही श्रद्धांजलि सभा में नहीं आ रहा है। दुष्ट। इतनी बदमाशी तो एक्सचेंज आफर वाले भी नहीं करते।
अपने सामने ही श्रदांजलि सभा कराना हो, तो कई अफसरों की सभा रौनकदार हो जायेगी। आईजी साहब जब आईजी नहीं रहेंगे, तो कौन आयेगा। अभी आईजी साहब करें अपनी श्रद्धांजलि सभा, पूरे एरिया के थानेदार चुन चुनकर श्रद्धांजलि मचा देंगे। इलाके का जो जेबकट श्रद्धासुमन अर्पित करने ना पहुंचे, उसका एनकाऊंटर।
चलूं प्रीपेड श्रद्धांजलि का धंधा पेटेंट करवा लूं किसी मल्टीनेशनल की नजर पड़ गयी इस धंधे पर तो ये धंधा भी विदेशी हो लेगा।
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अरे हम यहां से गुजर रहे थे, सोचा कि आपकी मातमपुर्सी करते चलें- ….. जल्द ही ये भी होने लगेगा,… क्रपया नये टैरिफ के आने तक प्रतीक्षा करें
Bahut mazedaar vyang… aur kadvi sachai ..
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यह तो बढ़िया तरीका है। बिल्कुल वैसा ही कि रईस अपना मकबरा खुद बनवा लेता था। या मेरी पत्नी के बब्बा हर साल अपनी तेरही का अनाज अलग रखा देते थे। इन पुराने तरीकों को नया रूप दिया जाना चाहिये!
हमारी और से श्रद्धा सुमन स्वीकारे , वो पुरानी बाते हो गई है जब लोग खुद आया करते थे आजकल ईमेल का जमाना है जी:)
सुनते हैं कि एक जमींदार साहब के कुत्ते के मरने पर मातमपुर्सी में पूरा इलाका उमड़ पड़ा था, लेकिन जब जमींदार साहब चल बसे तो कोई देखने भी नहीं गया। प्री-पेड व्यवस्था में उनकी ऐसी किरकिरी नहीं होती। अच्छा है।