संडे यूं ही-शौफर ड्रिवेन कार में शहर
वैधानिक चेतावनी-ये व्यंग्य नहीं है
संडे यूं ही-शौफर ड्रिवेन कार में शहर
आलोक पुराणिक
कार यूं अपने पास जो है, उसे अब कार नहीं, चार पहियों का स्कूटर माना जाता है मारुति 800। यूं कार चलाने में मुझे एकदम मजा नहीं आता।
मेरी आटो-आकांक्षाओं में हर्ले डेविडसन की मोटरसाइकिल है, जो बताया जाता है कि करीब 12 लाख की पड़ती है। अगर शेयर बाजार में दो चार दांव सही लग गये, तो पांच साल में ये ले ही लूंगा। खैर वो मसला नहीं है।
मसला यह है कि कार चलाना इन्जाय नहीं करता। शौफर वाली कार मिल जाती है, उन दिनों, जब टीवी चैनल कोई काम कराते हैं। टीवी चैनल घऱ भेजकर कार में उठाते है और फिर वापस गिरा देते हैं। उस दिन देखा रात के करीब ग्यारह बजे, शौफर ड्रिवेन कार में दिल्ली के गाजीपुर निजामुद्दीन हाईवे पे शहर बेहद खूबसूरत नजर आया। मन एकदम छायावादी टाइप हो लिया। अहा कितनी दूर फैली रोशनी की कतार, फ्लैट के ऊपर फ्लैट के फ्लैट के ऊपर के फ्लैट में कतारबद्ध रोशनी। अहा वो देखो बगल वाली कार में कितना सुंदर बच्चा। अहा हा बारिश की बूंदा बांदी के बाद कित्ता सुहावना मौसम।
मेरे दिमागी बैकअप ने मुझे सूचित किया, प्यारे यहीं सुबह साढ़े नौ बजे ट्रेफिक जाम में फंसकर तुम कितना किचिया रहे थे, हाय दिल्ली का ट्रेफिक। हाय इतने सारे लोग सुबह सुबह कहां जा रहे हैं. क्यों जा रहे हैं।
ससुरा शहर अच्छा या बुरा नहीं होता।
हम कहां से बैठकर देखते हैं, यह ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
छायावाद एकदम घुस जाता है, अगर बाइक पर चले बंदा। और दिल्ली की बसों में तो बंदा मवेशी योनि में आ जाता है। छायावाद नही,वहां तो खुरखुरावाद में एंट्री हो जाती है। कविताई के छायावाद युग से एकदम ठोस यथार्थवादी युग में प्रवेश हो जाता है।
मुझे लगता है कि जिस कार से नजारे इत्ते सुंदर लगते है। उसी कार के ड्राइवर को ये सब सुंदर ना लगता होगा। उसे लगता होगा कि इस चिरकुट को गिराऊंगा। फिर वापस जाऊंगा, फिर वहां से अपनी बाइक उठाकर घर जाऊंगा। कितना लेट हो जायेगा, रात का एक बजेगा।
क्या सही है, शौफर ड्रिवेन कार के शहर का छायावाद या फिर बाकी दिनों का झेलूवाद, मतलब सही तो दोनों ही है।
या सही कुछ भी नहीं है। सही या गलत का फैसला अपनी मनस्थिति या तनस्थिति से होता है
आपकी क्या राय है।
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आलोक भाई मैं अपनी चार पहियों की स्कूटर मारूति 800 मेक 2000 विद सीएनजी बेच रहा हूं। खरीदार तो बतला दो जो दो पहिये वाले स्कूटर से चार पहियों वाले स्कूटर को खरीदना चाहता हो और ईंधन खर्च दो पहियों वाले से भी कम। रंगीला रंग नीला, घावों जो सूखे हैं रिस नहीं रहे। सब स्वस्थ। है कोई जो अपनी सच्चाईयों को चार पहिये लगाना चाहता हो। संपर्क सूत्र 9868166586
फिर मैं भी नजारे देखूंगा मेट्रो में झूलूंगा
ट्रैफिक के दुख दर्द सारे अभी से भूलूंगा
बस में चढूंगा सावधान रहूंगा ओ कहूंगा
नीले न होना लाल, लाल न होना नीले
मधु शहर मस्ती का वाहन में बैठ पीले
सही है जी!! छायावाद भागादौड़ी या हड़बड़ी में नज़र नही आता, उसके लिए तो सुख न सही सुख का एहसास ही चाहिए!!
वैसे यह तो आपने सच्ची बात कही, दिन में कचरा सा लगने वाला अपना ही शहर रात के एक दो बजे देखने में कितना अच्छा सा लगता है शांत सा सुंदर सा। दिन में जिन सड़कों को भीड़ भरी होने के कारण गालियां देते हैं वही सड़कें रात के दो बजे कितनी अच्छी लगती है।
अंतिम बात एक्दमै सही, मन:स्थिति ही तय कराती है कि यह हालात आखिर है क्य।
हर्ले डेविडसन ले लें तो हमें भी बताईयेगा कुछ घंटे उस पर घूमने का आनंद अपुन भी उठाना चाहेंगे. इतनी टिप्प्णियां करने के बाद इतना तो हक बनता है.
पता तो चले डेविडसन पर बैठकर किस प्रकार के छायावाद की अनुभूति होती है.
पैदल - पैदल चला जाया जाये जी। सूअर और कचरे से भरी सडक पर सवेरे की सैर का अलग आनन्द है।
वैसे मेरा मत है कि तक्नालॉजी के विकास से यात्रा की जरूरतें कमतर होती जानी चाहियें।
ज्ञानदत्त जी पैदल चलना अब एक कला का रूतबा हो जाएगा। जो चालान कटवाएगा, वही पैदलकार माना जाएगा। आपने मेरा व्यंग्य हिम्मत है तो पैदल चल पढ़ा ही होगा। कल नवभारत टाइम्स में सहीराम जी का व्यंग्य पढ़िएगा। पैदल चलने वालों को व्यंग्य में सम्मानजनक स्थान हासिल हो रहा है आप उन्हें सूअर और कचरे से भरी सडक पर सवेरे की सैर करवाने को उद्यत हैं।
तक्नालॉजी के विकास से यात्रा की जरूरतें कमतर करने से पहले विचार लें कि ब्लॉग यात्रा भी तकनीकी श्रेष्टता से हासिल की गई है, उस पर पैदल कैसे चलेंगे, गर ब्राडबैंड कनैक्शन, कंप्यूटर और घनाघन साफ्टवेयर नहीं होंगे तो ….
Guru ji, aapke pas jo car hai, use to becar hi kahiye. Dhoni ne to ek aur anhoni kar di. Harle Devidson bhi kharid li. Pata nahi aapke danw kab lagenge ? TV channel walon ke liye to ye kahiye ki jaise car me uthaten hai, waise hi wapas ghar me fenk jaate hain. Bina car ghar bhi becar hai. lekin, Dilli ki bason me maveshi yoni me bhi yadi viprit yoni se khurkhurahat ho to premras me pravesh ho jata hai. So, satyawachan guru ji ki sahi-galat to mansthiti aur tansthiti hi tay karte hai. Gustakhi maf.
बढ़िया है । जब रात को शहर सुन्दर लगता है, कार में उठाये जाना और पटका जाना अच्छा लगता है तब तो कॉल सैन्टर की नौकरी सबसे बढ़िया है ।
घुघूती बासूती
हम तो बरसों से पत्नी जी को छायावाद दिखा रहे हैं. उस का सुख भी अजीब है। यथार्थवाद में रहते हुए छायावाद को झेलने का सुख।
शोफर ड्रिवन कार में बैठे रहें तसव्वुरे जानां किए हुए….
महोदय, इतना छोटा व्यंग लिखा आपने? ये तो शुरू होने के पहले ही ख़तम हो गया| अगली बार लम्बा सा लिखियेगा |