किससे बात करें
एक काम जो बरसों से होता रहा है, पर इधर कुछ ठप सा पड़ा हुआ है, वह है भारत पाकिस्तान की शांति वार्ता। जितनी भी हुई, उसमें शांति कम थी, वार्ता अधिक थी। पर अब वह भी नहीं है। सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान में वार्ता किससे की जाये ।
1- क्या राष्ट्रपति जरदारीजी से बात की जा सकती है। पाकिस्तान में पब्लिक का मानना है कि जरदारीजी से की जा सकती है, अगर बात नान सीरियस हो तो। पर भारत पाक शांति वार्ता नान सीरियस बात नहीं है। इसलिए जरदारीजी से बात करना बेकार है। जरदारी के मामले में एक बात और कही जाती है कि जरदारीजी को कोई सीरियसली नहीं लेता, खुद जरदारीजी भी खुद को सीरियसली नहीं लेते।
2- क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री गिलानीजी से बात की जा सकती है। गिलानीजी अपने सूट की वजह से सीरियस लगते हैं। पर अगर पर्सनल्टी में सीरियसनेस सिर्फ सूट के खाते में ही हो, तो फिर तो सिर्फ सूट से ही बात की जानी चाहिए। सूट चाहे जितने सीरियस हों, पर बोलते नहीं है। और गिलानीजी चाहे बोलते कितना ही हों, पर वह सीरियस नहीं हैं।
3- गिलानीजी को सीरियसली इसलिए नहीं माना जाता कि वह जरदारीजी के कैंडीडेट माने जाते हैं। जैसा कि बताया जा चुका है कि जरदारीजी को पाकिस्तान में उतना ही सीरियसली लिया जाता है, जितनी सीरियसता के साथ भारत में लाफ्टर चैलेंज देखा जाता है।
4- अफगानिस्तान से तालिबानियों से पाकिस्तान के बारे में सीरयसली बात की जा सकती है। जिस तरह से पाकिस्तान में जगह जगह धमाके हो रहे हैं, उसे देखकर तो लगता है कि पाकिस्तान में मुस्तैदी से दिल लगाकर काम तो सिर्फ तालिबानी ही कर रहे हैं। कर्मठ तालिबानियों से निवेदन किया जा सकता है कि अपना कर्मक्षेत्र पाकिस्तान तक ही सीमित रखें। पर तालिबानों से बात क्या हो सकती है। बम, बंदूक इन मसलों के अलावा तालिबानी कोई दूसरी बात नहीं कर सकते। इतने बम और उतनी बंदूकों से इलाका तबाह करना है,इसके अलावा दूसरा वाक्य तालिबानियों की समझ में नहीं आता है। तालिबानी तबाही के प्रति इतने कटिबद्ध हैं, कि कहीं दूसरे इलाके में तबाही नहीं मचा पा रहे हों, तो अपने ही इलाके में मचाना शुरु कर देते हैं। लाहौर और पेशावर के धमाके तो यही बताते हैं।
5- क्या पाकिस्तान के बारे में ओबामा से बात की जाये। ओबामा अकसर पाकिस्तान के बारे में बात करते रहते हैं। पर मसला यह है कि ओबामा को पाकिस्तान के नेता तब ही सीरियसली लेता है, जब ओबामा पाकिस्तान को डालर देने की घोषणा करते हैं। ओबामा की नान डालरीय घोषणा को पाकिस्तान सीरियसली नहीं लेता। पाकिस्तान में यूं ओबामा चाहें, तो जरदारीजी से बात कर सकते हैं, पर जरदारीजी के बारे में बताया जा चुका है कि उनकी चलती नहीं है। चलती तालिबानों की है, पर वो बात करने के लिए तैयार नहीं हैं।
6- बुश से बात करने का मतलब नहीं है। अमेरिका में हाल यह है कि अमेरिकी पत्रकार भी उनसे बात नहीं करते। अमेरिका में वाशिंगटन से रिटायर हुए नेता और हालीवुड से रिटायर हुई अभिनेत्री की गत एक सी होती है। दोनों सिर्फ संस्मरण सुनाने भर के रह जाते हैं।
अब आप ही बताइए कि पाकिस्तान में किससे बात की जाये।
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यह उन्हे ही तय करने दो कि किससे बात करनी चाहिए. हालात को देख लगता है, बात करने की जरूरत ही नहीं रहेगी, न पाक रहेगा न वार्ता करनी पड़ेगी.
हम क्या बतायें, कुलदीप नैय्यर जी से पूछा जाये!
असल में उधर कोई माई बाप नहीं है इसीलिए कोई जिम्मेदार बात करने वाला भी समझ में नहीं आता है ….
दीवारों से की जाये । उससे शायद कुछ निष्कर्ष निकल आये ।
बात करके बात नहीं बनी. अब चुप रहकर देखने में क्या बुराई है?
घुघूती बासूती
what type of dialoge you are writing, here is not clear your point of view.
mein to kahta hun, ki baat karke bhi kya haasil hoga. wahi dhaak ke teen paat.
मेरे विचार से पाकिस्तान में बात हमें ओसामा या फिर दाउद से करनी चाहिये, क्योंकि यही तो वो है जो अपनी शतरज में इन सबको मोहरे बना रहे है