अंधेरे का समाजवाद
Posted on January 20th, 2010 by alok
अंधेरा है, दूर तक अंधेरा है। ना जी, ये कोई कविता नहीं हो रही है। विशुद्ध यथार्थवाद है। बिजली गायब रहे, तो कवि जागृत नहीं होता। कविता लिखने की न्यूनतम जरुरतों में से एक बिजली की उपस्थिति है। यह तो व्यंग्यकार ही सख्त जान प्राणी है, जो बिजली जाने पर भी चिंतन कर [...]
Filed under: Uncategorized | 12 Comments »

