Posted on August 31st, 2009 by alok
यह निबंध उस छात्र की डायरी से लिया गया है, जिसने निबंध प्रतियोगिता में टाप किया है। निबंध प्रतियोगिता का विषय था-स्विस बैंक।
जैसा कि हम सभी नहीं जानते हैं कि स्विस में बैंकों में बहुत महत्व है। जैसे पुराने चंबल का नाम लेते ही डाकुओं की याद आती है, वैसे ही अब [...]
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Posted on August 28th, 2009 by alok
हाथी इकठ्ठे थे वहां, तरह तरह के।
काले हाथी, सफेद हाथी, छोटे हाथी, जंगल के हाथी, चिड़ियाघर के हाथी।
एक सीनियर हाथी बोला-सुना आपने, जिस पार्टी का निशान हाथी है, उसने हाथी की मूर्तियां बनवाने पर यह एक्सप्लेनेशन दिया है कि यह उसकी पार्टी का निशान नहीं है, बल्कि यह तो यूं ही पाया [...]
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Posted on August 22nd, 2009 by alok
लो जी, चांद पर इंसानों को गये हुए चालीस साल हो लिये।
चांद अपनी जगह पर बना हुआ है, इसीलिए कि वहां इंसान नहीं हैं। वरना चांद के हाल दूसरे होते। जहां जहां इंसानों के पैर फुलमफुल पड़ लिये हैं, वहां का भगवान भी मालिक नहीं है।
चांद पर अगर पाकिस्तानियों का [...]
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Posted on August 20th, 2009 by alok
यह निबंध उस छात्र की कापी से उड़ाया गया है, जिसे निबंध प्रतियोगिता में पहला स्थान मिला है। निबंध का विषय था-पान की शान।
पान खाने के तमाम फायदों में एक बड़ा फायदा यह है कि अच्छा खासा चिरकुट भी अकलमंद लगने लगता है।
कैसे, ऐसे कि पान खाने के बाद कुछ [...]
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Posted on August 18th, 2009 by alok
एक शायर ने एक मस्जिद की वीरानी देखकर लिखा था-
दिल खुश हुआ है, मस्जिदें वीरां को देखकर
मेरी तरह खुदा का भी खाना खऱाब है।
हम अलग फितरत के लोग हैं, सब अच्छा हो,तो तबीयत खराब सी होने लगती है। खराब खेल होने लगे, तो लगता है कि हां, अब नार्मल हो [...]
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