हारे को आत्मचिंतन

विकट आत्मचिंतन मचा हुआ है। इधर भी, उधर भी और उधर भी।
आत्मचिंतन ऐसा आइटम है, जो चुनावों के बाद हारने वाले खेमे में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। वैसे हारने वाले खेमे में एक औऱ तत्व प्रचुर मात्रा में पाया जाता है-सिर फुट्टौवल। पर यह काम थोड़ा आफ दि रिकार्ड तरीके [...]

प्रति व्यक्ति गढ्ढे

विकट आंकड़े आ रहे हैं –प्रति व्यक्ति आय बढ़कर तीन हजार रुपये प्रति व्यक्ति प्रति माह से ज्यादा हो गयी है।
मेरे हिस्से के तीन हजार मुझे नहीं मिले-एक इकोनोमिक एक्सपर्ट से मैंने पूछा।

उसने बताया-हमारा काम सिर्फ यह बताना है कि तीन हजार रुपये प्रति माह तुम्हारे हिस्से के हैं। ये [...]

संडे यूं ही-प्रेम से भागना मत

वैधानिक चेतावनी-यह व्यंग्य नहीं है
ओशो की पुस्तक-मन लागो यार फकीरी में से कुछ मेरे प्रिय अंश

…….सूरज की रोशनी पानी के बबूले पर सतरंगा इन्द्रधनुष बनाती है, क्षण भर को ही टिकेगा यह रंग, क्षण भर को टिकेगा यह होना। लेकिन संसार में क्षण भर को सुख मिलता है। न मिलता तो तो [...]

बिजलीमय मैं सब जग जानी

बिजली पर कवि जालीदास का रचनात्मक चिंतन इस प्रकार है-
1- रुखा सूखा खाय कर छत पर जाकर सोय
देख परायी बिजली, टेंशन में मत होय
भावार्थ-कई दिनों से बिजली नहीं आ रही है। फ्रिज काम नहीं कर रहा है। जो कुछ फ्रिज में रखा था, वह सब सूख गया है। सब रुखा हो गया है, [...]

आतंकवादी आलू, कातिल कटहल….

यह निबंध उस छात्र की कापी से लिया गया है, जिसने एमए हिंदी में निबंध के परचे में टाप किया है। निबंध का विषय था-महंगाई।
महंगाई का हमारे राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन में विशेष महत्व है।
महंगाई जब बढ़ती है, तो टीवी पर न्यूज वगैरह में थोड़ी वैराइटी आ जाती है। वैसे [...]