ऊपर वाले की हंडिया

ऊपर वाले की हंडिया
आलोक पुराणिक
कहावतें पुरानी हो ली हैं। नये बच्चों को समझाना बहुत मुश्किल है।
साझे की हंडिया चौराहे पर फूटती है-यह कहावत समझाने बच्चों को निकला, तो कुछ यूं बीती।
बेटा समझो, साझे की हंडिया, हंडिया मीन्स मिट्टी का बर्तन, वह चौराहे पर फूटती है। साझा मतलब पार्टनरशिप फर्म, मतलब जहां सब मिलजुलकर कारोबार चलाते हैं-मैंने समझाना शुरु किया।
ओ के मैं समझ गया कि सरकार एक पार्टनरशिप फर्म है, जहां लेफ्ट फ्रंट, कांग्रेस, लालूजी वगैरह साझीदार हैं। सब मिलकर अपना कारोबार चला रहे है। सब धंधा कर रहे हैं –स्टूडेंट ने अपनी समझदारी को साफ किया।
नहीं मतलब सरकार पूरे तौर पर पार्टनरशिप फर्म नहीं है-मैंने बात को साफ करने की कोशिश की।
ओ के अगर यह पार्टनरशिप फर्म नहीं है तो क्या है-स्टूडेंट बहुत तार्किक सवाल पूछ रहा है।
बेटे ये क्या है, यह तो बहुत मुश्किल सवाल है। वामपंथी कहते हैं कि यह सरकार के नाम पर अमेरिकन चमचा है। विपक्ष वाले कहते हैं कि यह कठपुतली है-मैंने अपनी जानकारी भर ज्ञान देने की कोशिश की।
ओ के वामपंथियों को अमेरिकन चमचे नहीं चाहिए, तो कौन से चमचे चाहिए। मतलब चीनी चमचे चाहिए क्या-स्टूडेंट पूछने लगा।
बेटे चमचे की बात नहीं है,ये समझो ना कि विपक्ष इसे कठपुतली सरकार कहता है-मैंने आगे समझाने की कोशिश की।
पर कठपुतली के बारे में तो पता होता है कि उसे कौन चलाता है, क्या हमे पता है कि इस सरकार को कौन चला रहा है-छात्र ने आगे पूछा।
नहीं बेटे, उसमें भी कनफ्यूजन है। कुछ कहते हैं कि इस सरकार को सोनिया गांधी चला रही हैं। कुछ कह रहे हैं कि नहीं, अब तो राहुल गांधी चला रहे हैं। कुछ कहते हैं कि इसे वामपंथी चला रहे हैं, हालांकि वामपंथी पार्टियां दिन में चार बार यह कहती हैं कि हम इसे चलने नहीं देंगे। पर हो सकता है वे ही चला रहे हों। पर कुछ का विचार है कि नहीं यह सरकार तो अमेरिकन खुद चला रहे हैं। कुछ का कहना है कि नहीं कभी-कभी इसे मनमोहन सिंह भी चलाते हैं। कुछ आस्तिक लोग कहते हैं कि इसे तो ऊपर वाला चला रहा है। ऊपर वाले ने अब तक इसका खंडन नहीं किया है, तो माना यह भी जा सकता है कि सरकार को ऊपर वाला चला रहा है-मैंने सरकार के बारे में अपनी जानकारियां पेश कीं।
जब आपको कुछ भी पक्के तौर पता नहीं है, तो आप समझाने क्यों आ जाते हो। पहले बता रहे थे कि साझे की हंडिया, अब बता रहे हो कि यह हंडिया ऊपर वाले की है। हंडिया से बात शुरु करते हो, फिर सरकार पर आ जाते हो-स्टूडेंट मुझे डांट रहा है।
सौरी बेटे, अब सरकार से शुरु होकर हंडिया तक जाने की कोशिश करुंगा-मैने फिर समझाने की कोशिश शुरु की है।
(जारी रहेगा कल भी हंडिया चिंतन)

10 Responses to “ऊपर वाले की हंडिया”

  1. वैसे सच में तो सरकार कोई भी नहीं चला वो तो अपने आप ही चली जा रही है. कब कहाँ निकल जायेगी कुछ पता नहीं. तब हंडिया फोड़ते रहियेगा.

    बच्चे सही कह रहा है जब आपको कुछ भी पक्के तौर पता नहीं है, तो आप समझाने क्यों आ जाते हो।

    यह बच्चा वहीं निबन्ध प्रतियोगिता वाला टॉपर तो नहीं है कहीं?? :)

  2. साझे की हंडिया चौराहे पर फूटती है
    —————————————–
    बड़ा सिम्पल सा समाधान आपने सुझा दिया। न रहे चौराहा, न फूटे हण्डिया, न जये सरकार। एक संवेधानिक परिवर्तन की है दरकार। सभी चौरस्तों का नामकरण तिराहा या पंचराहा कर दें। और फिर चाहे परस्पर सिर फोड़ें - सरकार जाने से रही।
    लेकिन कल आपके हण्डिया चिंतन में यही तो नहीं होना था? :-)

  3. ये साझे की हंडिया ही क्यों फूटती है.क्या सभी मिट्टी की हंडिया नहीं फूटती. इंटलीजेंट बालक सवाल कर रहा है.

  4. साझे की माँ भुखी मरती है और साझे की सुई पालकी से ढोई जाती है….

  5. हा समीर भाई ये मै ही हू आपने सही पहचाना..और इतना इंटेलीजेंट मेरे अलावा और कौन हो सकता है काकेश जी..:)

  6. :)

  7. बहुत बढ़िया!!

  8. मुझे बच्चे से पूर्ण सहानुभूति है । आज के नॉन स्टिक , माइक्रोवेव, जिसमें इस हंडिया में खाना नहीं पक सकता, के जमाने में यह आप क्या हंडिया की बात लेकर बैठ गए । हमने तक आजतक कोई हंडिया नहीं देखी है । अब जब देखी नहीं तो इसके अस्तित्व को कैसे मान लें ?
    वैसे भी भारत जबसे इंडिया बना है यहाँ हंडिया नहीं चलती ।
    घुघूती बासूती

  9. हाँ जी बहुत कन्फ़ुयन है मेरे भी दिमाग में या तो हंडिया कि बात करो या फ़िर सरकार की अब इत्ती छोटी सी अक्ल में दोनों ठेलोगे तो कैसन चलेगा जी

  10. सरकार चल रही है? ये मुख्य प्रशन है बनिस्पत ये जान ने के की कौन चला रहा है.अगर आप कहते हैं की चल रही है तो हमें चलने की परीभाषा को बदलना होगा.एक ही जगह खडे हो कर हिलने को चलना नहीं कहते.
    नीरज

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