टापमटाप वाया नाली
विभिन्न खेलों के साथ मेरे प्रयोगों के विवरण इस प्रकार हैं-
बिलियर्ड्स
प्राचीन फिल्मों में बिलियर्ड्स आम तौर पर स्मगलर और भ्रष्ट उद्योगपति खेलते थे। मतलब अब भी वे खेलते होंगे, पर अब वे फिल्मों में बिलियर्ड्स खेलते हुए दिखाये नहीं जाते। संभवत बिलियर्ड्स एसोसियेशन ने कुछ धमकी वगैरह दी होगी, उन्हे। पर प्राचीनकाल में ऐसा नहीं था।
बिलियर्ड्स खेलना हर तस्कर के लिए जरुरी था। हर भ्रष्ट उद्योगपति अगड़म बगड़म टाइप के फैसले बिलियर्ड्स स्टिक से बाल को मारते हुए लेता था। बिलियर्ड्स और स्मगलरों का पक्का साथ होता था। इत्ता पक्का वाला कि जब स्मगलर पब्लिक में आते थे, तो यह सवाल सहज ही उठता था कि इनकी बिलियर्ड स्टिक कहां है। मतलब जैसे डाकू तो अपनी बंदूक आत्मसमर्पण के टाइम रख देते थे, पर स्मलगर कभी आत्मसमर्पण नहीं करते थे। वे बिल्डर वगैरह, नेता वगैरह होकर राष्ट्र को सेवाएं देते थे। इस तरह से नयी पीढ़ी यह संदेश ग्रहण करती थी बिलियर्ड्स खेलना और स्मगलर होना डाकू होने के मुकाबले ज्यादा लांग टर्म कैरियर है और सेफ है।
पर मैं चूंकि बचपन से ही आलसी स्वभाव का था इसलिए बिलियर्ड्स तो मुझे रास आता था क्योंकि इसमें मैदान में दौड़ना नहीं पड़ता। पर इस ख्याल ने मुझे डरा दिया कि बिलियर्ड्स खेला तो मुझे स्मगलर बनना पड़ेगा। स्मगलिंग का काम मेहनत वाला था, उन दिनों, मतलब समुद्र में मोटरबोट पर भागना, सिगार पीते हुए फारेन स्मगलरों को इंटरटेन करते हुए हेलेन अथवा बिंदु के कैबरे वगैरह देखना भी स्मलगरों के रुटीन में शामिल होता था।
मुझे कैबरे पसंद नहीं थे, इसलिए स्मगलर नहीं हुआ और इसीलिए मैं बिलियर्डस से वंचित हो गया।
स्विमिंग
स्विमिंग से भी मुझे फिल्मों ने ही विमुख किया।
करीब 8790907 फिल्मों में मैने देखा कि स्मगलर किसी फाइव स्टार होटल के स्विमिंग पूल में स्विमिंग करके बाहर निकला है और कई तरह की सुंदरियां उसके आसपास हैं। बचपन में इस तरह का इंप्रेशन दिमाग में बन गया कि स्विमिंग करके बाहर निकले, तो इतनी सुंदरियां आसपास होंगी, इनके चायपानी का खर्च कहां से आयेगा। ना बाबा ना, स्विमिंग भी सिर्फ स्मगलिंग ही अफोर्ड़ कर सकते हैं। बहुत दिनों तक यह खाकसार इसी लपेटे में रहा कि इस मुल्क में कई चीजें स्मगलर टाइप लोग ही अफोर्ड कर सकते हैं। हालांकि एक हद तक यह बात अब भी सच है, कल धनिया के भाव सुनकर भी मुझे यही लगा कि स्विमिंग की तरह धनिया भी सिर्फ स्मगलर टाइप लोग ही ………..।
क्रिकेट
जिस गली में हमारा घर था, वहां वहां मैदान में चारों तरफ विकट महाभयंकर नालियां थीं।
सीनियर बायज जूनियर बायज को क्रिकेट को खेलने काबिल तब समझते थे, जब जूनियर बायज महाभीषण नालियों की अतल गहराईयों में हाथ डालकर (इस क्रिया को गेंद पपोलना कहा जाता था) गेंद निकाल लेते थे।
इस टेस्ट से सचिन तेंदुलकर को ना गुजरना पड़ा, पर इस खाकसार को गुजरना पड़ा। सचिन सौभाग्यशाली थे। मैं कामयाब ना हो पाया। मेरे साथ का एक बालक विभिन्न प्रकार की नालियों में तैरते हुए गेंद निकाल लेता था। हम सबको उम्मीद थी कि वह बहुत आगे जायेगा, और वह गया भी विधायक, सांसद होते हुए वह टाप क्लास नेता हो लिया। बहुत जल्दी वह बीसीसीआई में भी टाप पोस्ट पर जायेगा, ऐसी हम सब उम्मीद करते हैं। अब नये बच्चों को ताकीद देता हूं कि नालियों से परहेज ऱखोगे, तो ना क्रिकेटर बन पाओगे ना नेता।
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हा हा!! अब अखर रहा है कि बचपन में नालियों से क्यूँ परहेज कर गया. आपसा गुरु नहीं मिल पाया था तब.
काफी दूर की कौडी उठा लाए हैं आप………अच्छा लिखा।
अलोक भाई ये भी तो बताएं की हाकी, फुटबाल या बैडमिंटन क्यूँ ना खेली? ये तीन खेल तो समझ में आ गए की क्यूँ नहीं खेले. अच्छा चलो ये ही बता दो की आख़िर कौनसा खेल खेला और क्यूँ?
नीरज
सच सच बतायें; बिलियर्ड्स से मुद्राराक्षस में वृद्धि हो सकती है?! अगर पक्का हो तो सीखना प्रारम्भ करें!
बचपन में नालियों से बाल निकालने की प्रैक्टिस नहीं कर सका..गांव में रहता था लिहाजा क्रिकेट का खेल खेलते समय बाल तालाब में जाता था…वहां से निकालने की प्रैक्टिस थी. काश कि गांव में नालियाँ होती…