नेता उर्फ एग्जास्ट फैन
विकट गर्मी है, एग्जास्ट फैन चल रहा है। एग्जास्ट फैन को देखकर नेता की याद आ रही है। साफ साफ खींच लेता है, और गंद वापस बाहर छोड़ देता है।
मेरे मुहल्ले के एक नेता ने दारु का ठेका लिया है। मुहल्ले की कमाई का बड़ा हिस्सा वहां जा रहा है। लफंगई, बीमारी मुहल्ले में आ रही है।
नेता है या एग्जास्ट फैन समझ नहीं आता।
किसी एग्जास्ट फैन का नाम नेता ब्रांड एग्जास्ट फैन रखा जाये, तो सटीक होगा।
नेता तो बुरा नहीं मानेगा, इस ब्रांड नाम का। पर एग्जास्ट फैन बुरा मान सकते हैं कि हमे किस लेवल पर उतार दिया।
एग्जास्ट फैन बुरा मानें या ना मानें, पर हर काटने वाली चीज का ताल्लुक नेता से दिखायी पड़ता है। यूं एग्जास्ट फैन नेताओँ के मुकाबले कई मामलों में बेहतर हैं। एग्जास्ट फैन सिर्फ हवा काटता है, नेता तो नोट, पेट्रोल पंप से लेकर तोप तक काट सकता है। एग्जास्ट फैन नेताओं के मुकाबले बहुत सस्ता पड़ता है।
फिर इतिहास में किसी भी एग्जास्ट फैन पर यह आरोप नहीं लगा कि उसने अपने बाल बच्चों के लिए प्लाट, जमीन, ठेके लिए हों। खराब हो चुका एग्जास्ट फैन कतई जिद नहीं करता कि मुझे निकालने से पहले मेरे किसी रिश्तेदार को लगाओ। नेता इस मामले में एग्जास्ट फैन से गये बीते होते हैं। खराब से खराब नेता भी बेटे और बेटी के लिए राज्यसभा लोकसभा की टिकट चाहता है।
मैं कल्पना करता हूं कि कैसा विकट दृश्य हो, जब पब्लिक नेताओं को चुनकर भेजने के बजाय सिर्फ एग्जास्ट फैनों को भेज दे। तरह तरह के एग्जास्ट फैन चल रहे हैं संसद में। शोर मच रहा है। वैसे शोर तो अब भी मचता है, बल्कि एग्जास्ट फैनों के शोर के मुकाबले ज्यादा ही। एग्जास्ट फैन कम से कम वाकआऊट तो नहीं करेंगे। और पब्लिक इस भ्रम में तो रह सकती है कि उनके प्रतिनिधि काम तो करते हैं। अभी तो यह भ्रम रखने का मौका तक जन प्रतिनिधि पब्लिक को नहीं देते।
खैर, इधर एक घंटे बारिश हुई है, सारी नालियां गढ्ढे भर चली हैं।
सामने गढ्ढे में एक आदमी पूरा घुस गया है, वह मान कर चल रहा था कि गढ्ढा दो फुट का ही होगा, पर वह दस फुट का निकल गया। जितना समझा था, उससे बहुत ज्यादा गहरा। नेता भी ऐसे ही होते हैं, जितना समझो, उससे बहुत गहरे। जिन्हे सिर्फ इस पार्टी का समझो, वह उस पार्टी का भी निकलता है। उस पार्टी वाला पता नहीं किस पार्टी का निकलता है। जिसके बारे में समझो कि इसने तो सिर्फ कोलतार कांड में खाया है, वह तो चीनी घोटाले का भी खाऊ निकलता है। जितना समझो, उससे बहुत ज्यादा गहरा। नेता और गढ्ढे में बहुत समानता दिखायी पड़ रही है।
खैर अब चिंतन करना बेकार है। जिस पर चिंतन करो, वह आखिर में नेता से जुड़ा ही निकलता है। नेतामय मैं सब जग जानी, ……।
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आप तो नेता को हैण्ड पम्प ही मानो. उपर से छोटे से और जमीन के भीतर ८० फुट..
चकाचक लिखे हैं.
संसद में साढ़े पांच सौ एग्झास्ट फैन चल रहे हैं। विकट हवा है। उनकी पावर से परेशान माननीय सोमनाथ चटर्जी अपनी मेज कस के पकड़े हैं - वर्ना एग्झास्ट खींच लें उनको। उनके कागज पत्तर तो खिंचे जा चुके हैं।
क्या सीन होगा यह!
क्या तुक भिड़ाया है। शानदार!
जीवन भर अनवरत चलने के बावजूद नेता कभी एग्झास्ट नहीं होता. कोई एग्झास्ट फैन इस क्षमता का मुकाबला नहीं कर सकता. ज्योति बाबु अभी केवल ९२ के हैं. कभी कभी बाकियों को गरिया लेते हैं.
नेता पर जितना लिखा जाए उतना कम है. बहुत कठिन विषय है यह. पर बहुत अच्छा लिखा है आपने.
इस बार किसी एग्जास्ट फैन को वोट दूंगा.
ये नेता लोग लोगो को उल्लू बना कर गड्डे में गिराते हैं बेचारा आखिर गलत फहमी मे गिर ही गया।
लेकिन ऐसे ही नेताओं के फैन भी मिल जायेंगे…बहुत धाँसू पोस्ट.